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।। श्रीमुरलीधरगोपालाष्टकम् ।।

।। श्रीमुरलीधरगोपालाष्टकम् ।।

नमामि गोपिकाकान्तं द्विभुजं मुरलीधरम्।

शोणाधरं गिरिधरं भक्तदुःखहरं हरिम्।।१।।

सतोयमेघद्युतिगर्वहारिस्फुरद्युतिः स्मर्तृभयापहारि।।

कृष्णाय भूम्ने कमलावराय नमोsस्तु तस्मै मुरलीधराय।।२।।

यो भूमिभारव्यपनुत्तयेsत्र ब्रह्मादिदेवार्थित एव पुत्रः।।

बभूव भुव्यानकदुन्दुभेर्यो नमोsस्तु तस्मै मुरलीधराय।।३।।

अपाययत्स्तन्यमिषाद्विषं या तस्यै ददौ मात्रुचितां गतिं यः।।

कारुण्यसिंधुर्निहितासुराय नमोsस्तु तस्मै मुरलीधराय।।४।।

गाश्चारयन्गोपकुमारयुक्तः सुरद्विषोsहन्निजकार्यसक्तः।।

भक्तप्रियो यो दिविषद्वराय नमोsस्तु तस्मै मुरलीधराय।।५।।

यद्वेणुशब्दश्रवणेनसद्यो ह्यचेतनं चेतनतां परं च।।

तथान्यभावं प्रगतं पराय नमोsस्तु तस्मै मुरलीधराय।।६।।

व्याजेन भर्तृत्वमितं विवर्णं त्यक्त्वा सती दग्धतनुर्बभूव।।

वेणुर्यदोष्ठामृतभाक्पराय नमोsस्तु तस्मै मुरलीधराय।।७।।

गोपालाय नमस्तुभ्यमपराधान्क्षमस्व मे।।

कृपां कुरु दयासिन्धो सर्वान्कामान्प्रपूरय।।८।।

।। इति श्री प. प. श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचितं श्रीमुरलीधरगोपालाष्टकं संपूर्णम् ।।

समर्थ रामदास रचित || श्री नरसिंह पंचक ||

|| श्री नरसिंह पंचक || नरहरी नरपाळें भक्तपाळें भुपाळें। प्रगट रूप विशाळें दाविलें लोकपाळें। खवळत रिपुकाळें काळकाळें कळाळें। तट तट तट स्तंभि ...

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