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श्री कृष्णाची आरती (आरती कशी करू गोपाळा)

 

आरती कशी करू गोपाळा

ज्याने व्यापियले जगताला ।।धृ।।

निरांजन दीप कर्पूरवात

तुम्हीच झाला राधाकांत  ।।1।।

तुम्हीच दीपक तुम्हीच प्रकाशक

तुम्हीच स्वामी तुम्हीच सेवक  ।।2।।

तुम्हीच दाता तुम्हीच त्राता

करूनिया करता जग निर्मियता   ।।3।।

आता देऊन मी पण मन्मती 

दास करीतो मंगल आरती   ।।4।।

आरती कशी करू गोपाळा

ज्याने व्यापियले जगताला   ।।5।।

 


श्रीकृष्ण आरती 3 (जय जय कृष्ण नाथा)

जय जय कृष्ण नाथा तिन्ही लोकींच्या ताता

आरती ओवळीता हरली घोर भव चिंता ।।धृ।।

धन्य ते गोकुळ हो जेथे करी कृष्ण लीला

धन्य ती देवकी माता कृष्ण नवमास जोपासला।।1।।

धन्य तो वासुदेव कृष्ण गुप्त पणे रक्षिला

धन्य ती यमुना माई कृष्णा पदी ठेवी माथा ।। 2 ।।

धन्य ती नंद यशोदा ज्यांनी प्रभू खेळविला

धन्य ते बाळ गोपाळ कृष्ण देई दही काला।।3।।

धन्य ते गोप गोपी अनुभवती सुख सोहळा

धन्य राधा रुक्मिणी जणू कृष्ण भक्ती सरिता ।।4।।

 


अच्युतं केशवं रामनारायणं

अच्युतं केशवं रामनारायणं
कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम्।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं
जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे।।1।।

अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं
माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम्।
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं
देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे।।2।।

विष्णवे जिष्णवे शंखिने चक्रिणे
रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये।
वल्लवीवल्लभायार्चितायात्मने
कंसविध्वंसिने वंशिने ते नम:।।3।।

कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण
श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे।
अच्युतानन्त हे माधवाधोक्षज
द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक।।4।।

राक्षसक्षोभित: सीतया शोभितो
दण्डकारण्यभूपुण्यताकारण:।
लक्ष्मणेनान्वितो वानरै: सेवितो-
Sगस्त्यसम्पूजितो राघव: पातु माम्।।5।।

धेनुकारिष्टकानिष्टकृद्द्वेषिहा
केशिहा कंसहृद्वंशिकावादक:।
पूतनाकोपक: सूरजाखेलनो
बालगोपालक: पातु मां सर्वदा।।6।।

विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं
प्रावृडम्भोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम्।
वन्यया मालया शोभितोर:स्थलं
लोहितांघ्रिद्वयं वारिजाक्षं भजे।।7।।

कुंचितै: कुन्तलैर्भ्राजमानाननं
रत्नमौलिं लसत्कुण्डलं गण्डयो:।
हारकेयूरकं कंकणप्रोज्ज्वलं
किंकिणीमंजुलं श्यामलं तं भजे।।8।।

अच्युतस्याष्टकं य: पठेदिष्टदं
प्रेमत: प्रत्यहं पूरुष: सस्पृहम्।
वृत्तत: सुन्दरं कर्तृविश्वम्भर-
स्तस्य वश्यो हरिर्जायते सत्वरम्।।9।।

इति श्रीमच्छंकराचार्यकृतमच्युताष्टकं सम्पूर्णम्।

।। श्री कृष्णाची आरती ।।

।। श्री कृष्णाची आरती ।।

 

ओवाळूं आरती मदनगोपाळा । श्यामसुंदर गळां वैजयंतीमाला ।।धृ।। 

चरणकमल ज्याचे अति सुकुमार। ध्वजवज्रांकुश ब्रीदांचे तोडर।।१ ॥ 

नाभिकमलीं ज्याचे ब्रह्ययाचें स्थान। हृदयीं पदक शोभे श्रीवलत्सलांच्छन।।२।। 

मुखकमल पाहतां सूखाचिच्या कोटी। वेधले मानस हारपली दृष्टी ।।३।। 

जडित मुगुट ज्याचा दैदिप्यमान। तेणें तेजें कोंदलें अवघे त्रिभुवन।।४। 

एका जनार्दनी देखियलें रूप। रूप पाहता जाहले झालें तद्रूप।।५।। 

ओंवाळू आरती मदनगोपाळा। श्यामसुंदर गळां वैजयंतीमाळा।।

 


भगवान श्रीकृष्ण स्तोत्र

भगवान श्रीकृष्ण स्तोत्र

साष्टांग नमन माझे देवकीनंदना, वसुदेवसुता श्रीकृष्णा ।
अनन्यभक्तीने प्रतिदिनी स्मरता, सकल मनकामना साधती ॥
प्रथम वंदितो ऋषीकेशा दयाळा, गळा वैजयंतीमाळा ।
दुसरे नमन माझे शंखचक्रपद्मगदाधारी श्रीहरीलक्ष्मीनारायणा ॥
तिसरे पुंडरीकाक्ष केशवा चवथे मुरलीधरा माधवा ।
पाचवे गोविंद गुणातीत वासुदेवा, सहावे सर्वेश्वर संकर्षणा ॥
सातवे विश्वमूर्ती अनिरूध्दा, आठवे पुरूषोत्तम प्रद्युम्ना ।
नववे योगेश्वर श्रीकृष्णा, दहावे धन्वन्तरी जनार्दना ॥
अकरावे अक्षर श्रीविष्णु, द्वादश पितांबरधारी अच्युता ।
द्वादश ही श्रीकृष्णाची नावे, भक्तिभावे प्रतिदिनी जे स्मरती ।
द्वारकाधीश रूक्मिणीपती श्रीकृष्ण त्यास भवसागरातून तारती ॥
तूच कर्ता, तूच करविता, तूच सर्वांचा आधार ।
अनन्यशरणागत भक्तांचा योगक्षेम चालविण्याचा तुझा निर्धार ॥
'सुदीप'ने श्रध्देने रचिलेले हे स्तोत्र संपूर्ण ।
सच्चिदानंद, भक्तवत्सल, तुलसीप्रिय श्रीकृष्ण माऊली
तव चरणी अर्पण ॥


श्रीशंकराचार्य द्वारा रचित श्रीकृष्ण कृपाकटाक्ष स्तोत्र

श्रीशंकराचार्य द्वारा रचित श्रीकृष्ण कृपाकटाक्ष स्तोत्र

भजे व्रजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं,
स्वभक्तचित्तरंजनं सदैव नन्दनन्दनम्।
सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं,
अनंगरंगसागरं नमामि कृष्णनागरम्॥१॥

भावार्थ–व्रजभूमि के एकमात्र आभूषण, समस्त पापों को नष्ट करने वाले तथा अपने भक्तों के चित्त को आनन्द देने वाले नन्दनन्दन को सदैव भजता हूँ, जिनके मस्तक पर मोरमुकुट है, हाथों में सुरीली बांसुरी है तथा जो प्रेम-तरंगों के सागर हैं, उन नटनागर श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ।


मनोजगर्वमोचनं विशाललोललोचनं,
विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम्।
करारविन्दभूधरं स्मितावलोकसुन्दरं,
महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्ण वारणम्॥२॥

भावार्थ–कामदेव का मान मर्दन करने वाले, बड़े-बड़े सुन्दर चंचल नेत्रों वाले तथा व्रजगोपों का शोक हरने वाले कमलनयन भगवान को मेरा नमस्कार है, जिन्होंने अपने करकमलों पर गिरिराज को धारण किया था तथा जिनकी मुसकान और चितवन अति मनोहर है, देवराज इन्द्र का मान-मर्दन करने वाले, गजराज के सदृश मत्त श्रीकृष्ण भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ।


कदम्बसूनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं,
व्रजांगनैकवल्लभं नमामि कृष्णदुर्लभम्।
यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया,
युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम्॥३॥

भावार्थ–जिनके कानों में कदम्बपुष्पों के कुंडल हैं, जिनके अत्यन्त सुन्दर कपोल हैं तथा व्रजबालाओं के जो एकमात्र प्राणाधार हैं, उन दुर्लभ भगवान कृष्ण को नमस्कार करता हूँ; जो गोपगण और नन्दजी के सहित अति प्रसन्न यशोदाजी से युक्त हैं और एकमात्र आनन्ददायक हैं, उन गोपनायक गोपाल को नमस्कार करता हूँ।


सदैव पादपंकजं मदीय मानसे निजं,
दधानमुक्तमालकं नमामि नन्दबालकम्।
समस्तदोषशोषणं समस्तलोकपोषणं,
समस्तगोपमानसं नमामि नन्दलालसम्॥४॥

भावार्थ–जिन्होंने मेरे मनरूपी सरोवर में अपने चरणकमलों को स्थापित कर रखा है, उन अति सुन्दर अलकों वाले नन्दकुमार को नमस्कार करता हूँ तथा समस्त दोषों को दूर करने वाले, समस्त लोकों का पालन करने वाले और समस्त व्रजगोपों के हृदय तथा नन्दजी की वात्सल्य लालसा के आधार श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ।


भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं,
यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम्।
दृगन्तकान्तभंगिनं सदा सदालिसंगिनं,
दिने-दिने नवं-नवं नमामि नन्दसम्भवम्॥५॥

भावार्थ–भूमि का भार उतारने वाले, भवसागर से तारने वाले कर्णधार श्रीयशोदाकिशोर चित्तचोर को मेरा नमस्कार है। कमनीय कटाक्ष चलाने की कला में प्रवीण सर्वदा दिव्य सखियोंसे सेवित, नित्य नए-नए प्रतीत होने वाले नन्दलाल को मेरा नमस्कार है।


गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपापरं,
सुरद्विषन्निकन्दनं नमामि गोपनन्दनं।
नवीन गोपनागरं नवीनकेलि-लम्पटं,
नमामि मेघसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम्।।६।।

भावार्थ–गुणों की खान और आनन्द के निधान कृपा करने वाले तथा कृपा पर कृपा करने के लिए तत्पर देवताओं के शत्रु दैत्यों का नाश करने वाले गोपनन्दन को मेरा नमस्कार है। नवीन-गोप सखा नटवर नवीन खेल खेलने के लिए लालायित, घनश्याम अंग वाले, बिजली सदृश सुन्दर पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है।


समस्त गोप मोहनं, हृदम्बुजैक मोदनं,
नमामिकुंजमध्यगं प्रसन्न भानुशोभनम्।
निकामकामदायकं दृगन्तचारुसायकं,
रसालवेणुगायकं नमामिकुंजनायकम्।।७।।

भावार्थ–समस्त गोपों को आनन्दित करने वाले, हृदयकमल को प्रफुल्लित करने वाले, निकुंज के बीच में विराजमान, प्रसन्नमन सूर्य के समान प्रकाशमान श्रीकृष्ण भगवान को मेरा नमस्कार है। सम्पूर्ण अभिलिषित कामनाओं को पूर्ण करने वाले, वाणों के समान चोट करने वाली चितवन वाले, मधुर मुरली में गीत गाने वाले, निकुंजनायक को मेरा नमस्कार है।


विदग्ध गोपिकामनो मनोज्ञतल्पशायिनं,
नमामि कुंजकानने प्रवृद्धवह्निपायिनम्।
किशोरकान्ति रंजितं दृगंजनं सुशोभितं,
गजेन्द्रमोक्षकारिणं नमामि श्रीविहारिणम्।।८।।

भावार्थ–चतुरगोपिकाओं की मनोज्ञ तल्प पर शयन करने वाले, कुंजवन में बढ़ी हुई विरह अग्नि को पान करने वाले, किशोरावस्था की कान्ति से सुशोभित अंग वाले, अंजन लगे सुन्दर नेत्रों वाले, गजेन्द्र को ग्राह से मुक्त करने वाले, श्रीजी के साथ विहार करने वाले श्रीकृष्णचन्द्र को नमस्कार करता हूँ।


स्तोत्र पाठ का फल

यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्णसत्कथा,
मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम्।
प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य यः पुमान्,
भवेत्स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान॥९॥
प्रभो! मेरे ऊपर ऐसी कृपा हो कि जहां-कहीं जैसी भी परिस्थिति में रहूँ, सदा आपकी सत्कथाओं का गान करूँ। जो पुरुष इन दोनों-राधा कृपाकटाक्ष व श्रीकृष्ण कृपाकटाक्ष अष्टकों का पाठ या जप करेगा, वह जन्म-जन्म में नन्दनन्दन श्यामसुन्दर की भक्ति से युक्त होगा और उसको साक्षात् श्रीकृष्ण मिलते हैं।



संतान गोपाल स्तोत्र श्लोक 70 ते 101

संतान गोपाल स्तोत्र श्लोक 70 ते 101

वंशविस्तारकं पुत्रं देहि मे मधुसूदन ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥७०॥

ममाभीष्टसुतं देहि कंसारे माधवाच्युत ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥७१॥
चन्द्रार्ककल्पपर्यन्तं तनयं देहि माधव ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥७२॥
विद्यावन्तं बुद्धिमन्तं श्रीमन्तं तनयं सदा ।
देहि मे तनयं कृष्ण देवकीनन्दन प्रभो ॥७३॥
नमामि त्वां पद्मनेत्र सुतलाभाय कामदम् ।
मुकुन्दं पुण्डरीकाक्षं गोविन्दं मधुसूदनम् ॥७४॥
भगवन् कृष्ण गोविन्द सर्वकामफलप्रद ।
देहि मे तनयं स्वामिंस्त्वामहं शरणं गतः ॥७५॥
स्वामिंस्त्वं भगवन् राम कृष्न माधव कामद ।
देहि मे तनयं नित्यं त्वामहं शरणं गतः ॥७६॥
तनयं देहिओ गोविन्द कञ्जाक्ष कमलापते ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥७७॥
पद्मापते पद्मनेत्र प्रद्युम्न जनक प्रभो ।
सुतं देहि सुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥७८॥
शङ्खचक्रगदाखड्गशार्ङ्गपाणे रमापते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥७९॥
नारायण रमानाथ राजीवपत्रलोचन ।
सुतं मे देहि देवेश पद्मपद्मानुवन्दित ॥८०॥

राम राघव गोविन्द देवकीवरनन्दन ।
रुक्मिणीनाथ सर्वेश नारदादिसुरार्चित ॥८१॥
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥८२॥
मुनिवन्दित गोविन्द रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥८३॥
गोपिकार्जितपङ्केजमरन्दासक्तमानस ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥८४॥
रमाहृदयपङ्केजलोल माधव कामद ।
ममाभीष्टसुतं देहि त्वामहं शरणं गतः ॥८५॥
वासुदेव रमानाथ दासानां मङ्गलप्रद ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥८६॥
कल्याणप्रद गोविन्द मुरारे मुनिवन्दित ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥८७॥
पुत्रप्रद मुकुन्देश रुक्मिणीवल्लभ प्रभो ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥८८॥
पुण्डरीकाक्ष गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥८९॥
दयानिधे वासुदेव मुकुन्द मुनिवन्दित ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥९०॥

पुत्रसम्पत्प्रदातारं गोविन्दं देवपूजितम् ।
वन्दामहे सदा कृष्णं पुत्र लाभ प्रदायिनम् ॥९१॥
कारुण्यनिधये गोपीवल्लभाय मुरारये ।
नमस्ते पुत्रलाभाय देहि मे तनयं विभो ॥९२॥
नमस्तस्मै रमेशाय रुमिणीवल्लभाय ते ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥९३॥
नमस्ते वासुदेवाय नित्यश्रीकामुकाय च ।
पुत्रदाय च सर्पेन्द्रशायिने रङ्गशायिने ॥९४॥
रङ्गशायिन् रमानाथ मङ्गलप्रद माधव ।
देहि मे तनयं श्रीश गोपबालकनायक ॥९५॥
दासस्य मे सुतं देहि दीनमन्दार राघव ।
सुतं देहि सुतं देहि पुत्रं देहि रमापते ॥९६॥
यशोदातनयाभीष्टपुत्रदानरतः सदा ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥९७॥
मदिष्टदेव गोविन्द वासुदेव जनार्दन ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥९८॥
नीतिमान् धनवान् पुत्रो विद्यावांश्च प्रजापते ।
भगवंस्त्वत्कृपायाश्च वासुदेवेन्द्रपूजित ॥९९॥
यःपठेत् पुत्रशतकं सोऽपि सत्पुत्रवान् भवेत ।
श्रीवासुदेवकथितं स्तोत्ररत्नं सुखाय च ॥१००॥

जपकाले पठेन्नित्यं पुत्रलाभं धनं श्रियम् ।
ऐश्वर्यं राजसम्मानं सद्यो याति न संशयः ॥१०१॥


॥ श्लोकत्रयम् ॥

॥ श्लोकत्रयम् ॥ 

प्रातः स्मरामि भवभीति महार्ति शान्त्यै नारायणं गरुड वाहन मञ्जनाभम् । ग्राहाभि भूत मदवारण मुक्ति हेतुं चक्रायुधं तरुण वारिज पत्रनेत्रम् ॥ प्रातर्नमामि मनसा वचसा च मूर्ध्ना पादारविन्द युगळं परमस्य पुंसः । नारायणस्य नरकार्णव तारणस्य पारायण प्रवण विप्र परायणस्य ॥ प्रातर्भजामि भजता मभयं करं तं प्राक् सर्व जन्म कृत पाप भयापनुत्यै । यो ग्राहवक्त्र पतितान्घ्रि गजेन्द्र घोर शोक प्रणाशन करो धृत शङ्ख चक्रः ॥ श्लोकत्रयमिदं पुण्यं प्रातरुत्थाय यः पठेत् लोकत्रय गुरुस्तस्मै दध्यादात्मपदं हरिः 


॥ गजेन्द्र मोक्षम् ॥

॥ गजेन्द्र मोक्षम् ॥ 

ग्राहग्रस्ते गजेन्द्रे रुवति सरभसं तार्क्ष्य मारुह्य धावन् व्याघूर्णन् माल्यभूषा वसन परिकरो मेघ गम्भीर घोषः । आबिभ्राणो रथाङ्गं शरमसि मभयं शङ्ख चापौ सखेटौ हस्तैः कौमोदकी मप्यवतु हरिरसा वंहसां संहतेर्नः ॥ नक्राक्रान्ते करीन्द्रे मुकुळित नयने मूल मूलेतिखिन्ने नाहं नाहं नचाहं न च भवति पुनस्तादृशो मादृशेषु इत्येवं त्यक्तहस्ते सपदि सुरगणे भाव शून्ये समस्ते मूलं यत्प्रादुरासीत् स दिशतु भगवान् मङ्गळं सन्ततं नः ॥


॥ नन्दनन्दन श्रीकृष्णाष्टकम् ॥

॥ नन्दनन्दन श्रीकृष्णाष्टकम् ॥
भजे व्रजैकमंडनं समस्तपापखण्डनं स्वभक्तचित्तरंजनं सदैव नन्दनन्दनम् । सुपिच्छगुच्छ-मस्तकं सुनादवेणुहस्तकं अनंगरंगसागरं नमामि कृष्ण-नागरम् ॥ १ ॥

मनोज-गर्वमोचनं विशाल-लोल-लोचनं विधूतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम् । करारविन्दभूवरं स्मितावलोकसुन्दरं महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्णवारणम् ॥ २ ॥

कदम्बसूनकुण्डलं सचारुगण्डमण्डलं व्रजाङ्गनैकवल्लभं नमामि कृष्ण-दुर्लभम् । यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम् ॥ ३ ॥

सदैव पादपंकजं मदीयमानसे निजं दधानमुत्तमालकं नमामि नन्दबालकम् । समस्तदोष-शोषणं समस्तलोकपोषणं समस्तगोप-मानसं नमामि कृष्णलालसम् ॥ ४ ॥

भुवो भरावतारकं भवाब्धिकर्णधारकं यशोमती-किशू-रकं नमामि दुग्धचोरकम् । दृगन्तकान्तभंगिनं सदासदालसंगिनं दिनेदिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम् ॥ ५ ॥

गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपावरं सुरद्विष-न्निकन्दनं नमामि गोपनन्दनम् । नवीनगोपनागरं नवीनकेलि-लम्पटं नमामि मेघसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम् ॥ ६ ॥

समस्तगोपनन्दनं हृदम्बुजैकमोहनं नमामि कुंजमध्यगं प्रसन्नभानुशोभनम् । निकाम-कामदायकं दृगन्तचारु-सायकं रसालवेणु-गायकं नमामि कुंजनायकम् ॥ ७ ॥

विदग्ध-गोपिका-मनो-मनोज्ञतल्प-शायिनं नमामि कुंजकानने प्रवृद्ध-वह्नि-पायिनम् । यदा तदा यथा तथा तथैव कृष्णसत्कथा मया सदैव गीयतां तथा कृपा विधीयताम् । प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य यः पुमान् भवेत् स नन्दनन्दने भवे भवे सुभक्तिमान् ॥ ८ ॥


॥ चतुःस्लोकी ॥

॥ चतुःस्लोकी ॥
कान्तस्ते पुतुषोत्तमः फणिपतिः शय्याऽसनं वाहनं वेदात्मा विहगेश्वरो यवनिका माया जगन्मोहिनी । ब्रह्मेशादिसुरव्रजः सदयितः त्वद्दासदासीगणः श्रीरित्येव च नाम ते भगवति ! ब्रूमः कथं त्वां वयम् ॥ १ ॥

यस्यास्ते महिमानमात्मन इव त्वद्वल्लभोऽपि प्रभुः नालं मातुमियत्तया निरवधिं नित्यानुकूलं स्वतः । तां त्वां दास इति प्रपन्न इति च स्तोष्याम्यहं निर्भयः लोकैकेश्वरि ! लोकनाथदयिते ! दान्ते दयां ते विदन् ॥ २ ॥

ईषत् त्वत्करुणानिरीक्षणसुधासन्धुक्षणाद्रक्ष्यते नष्टं प्राक् तदलाभतस्त्रिभुवनं सम्प्रत्यनन्तोदयम् । श्रेयो न ह्यरविन्दलोचनमनःकान्ताप्रसादादृते संसृत्यक्षरवैष्णवाध्वसु नृणां सम्भाव्यते कर्हिचित् ॥ ३ ॥

शान्तानन्तमहाविभूति परमं यद् ब्रह्म रूपं हरेः मूर्तं ब्रह्म ततोऽपि तत्प्रियतरं रूपं यदत्यद्भुतम् । यान्यन्यानि यथासुखं विहरतो रूपाणि सर्वाणि ता - न्याहुः स्वैरनरूपरूपविभवैर्गाढोपगूढानि ते ॥ ४ ॥


॥ गोदा स्तुतिः ॥

॥ गोदा स्तुतिः ॥
श्रीविष्णुचित्त कुल नन्दन कल्पवल्लीं श्रीरङ्गराज हरिचन्दन योग दृश्यम् । साक्षात् शमां करुणया कमलामिवान्यां गोदामनन्यशरणः शरणं प्रपद्ये ॥ १ ॥

वैदेशिकः श्रुति गिरामपि भूयसीनां वर्णेषु माति महिमा न हि मादृशां ते । इत्थं विदन्तमपि मां सहसैव गोदे मौन द्रुहो मुखरयन्ति गुणास्त्वदीयाः ॥ २ ॥

त्वत्प्रेयसः श्रवणयोरमृतायमानां तुल्यां त्वदीय मणि नूपुर शिञ्जितानाम् । गोदे त्वमेव जननि त्वदभिष्टवार्हां वाचं प्रसन्न मधुरां मम संविधेहि ॥ ३ ॥

कृष्णान्वयेन दधतीं यमुनानुभावं तीर्थैर्यथावदवगाह्य सरस्वतीं ते । गोदे विकस्वर धियां भवती कटाक्षात् वाचः स्फुरन्ति मकरन्द मुचः कवीनाम् ॥ ४ ॥

अस्मादृशामपकृतौ चिर दीक्षितानां अह्नाय देवि दयते यदसौ मुकुन्दः । तन्निश्चितं नियमितस्तव मौलि दाम्ना तन्त्री निनादमधुरैश्च गिरां निगुम्भैः ॥ ५ ॥

शोणाऽधरेऽपि कुचयोरपि तुङ्गभद्रा वाचां प्रवाहनिवहेऽपि सरस्वती त्वम् । अप्राकृतैरपि रसैर्विरजा स्वभावात् गोदाऽपि देवि कमितुर्ननु नर्मदाऽसि ॥ ६ ॥

वल्मीकतः श्रवणतो वसुधात्मनस्ते जातो बभूव स मुनिः कवि सार्वभौमः । गोदे किमद्भुतमिदं यदमी स्वदन्ते वक्त्रारविन्द मकरन्द निभाः प्रबन्धाः ॥ ७ ॥

भोक्तुं तव प्रियतमं भवतीव गोदे भक्तिं निजां प्रणय भावनया गृणन्तः । उच्चावचैर्विरह सङ्गमजैरुदन्तैः शृङ्गारयन्ति हृदयं गुरवस्त्वदीयाः ॥ ८ ॥

मातः समुत्थितवतीमधि विष्णुचित्तं विश्वोपजीव्यममृतं वचसा दुहानाम् । तापच्छिदं हिम रुचेरिव मूर्तिमन्यां सन्तः पयोधि दुहितुः सहजां विदुस्त्वाम् ॥ ९ ॥

तातस्तु ते मधुभिदः स्तुति लेश वश्यात् कर्णामृतैः स्तुति शतैरनवाप्त पूर्वम् । त्वन्मौलि गन्ध सुभगामुपहृत्य मालां लेभे महत्तर पदानुगुणं प्रसादम् ॥ १० ॥

दिक् दक्षिणाऽपि परि पक्त्रिम पुण्य लभ्यात् सर्वोत्तरा भवति देवि तवावतारात् । यत्रैव रङ्गपतिना बहुमान पूर्वं निद्रालुनापि नियतं निहिताः कटाक्षाः ॥ ११ ॥

प्रायेण देवि भवती व्यपदेश योगात् गोदावरी जगदिदं पयसा पुनीते । यस्यां समेत्य समयेषु चिरं निवासात् भागीरथी प्रभृतयोऽपि भवन्ति पुण्याः ॥ १२ ॥

नागे शयः सुतनु पक्षिरथः कथं ते जातः स्वयंवर पतिः पुरुषः पुराणः । एवं विधाः समुचितं प्रणयं भवत्याः सन्दर्शयन्ति परिहास गिरः सखीनाम् ॥ १३ ॥

त्वद्भुक्त माल्य सुरभीकृत चारु मौलेः हित्वा भुजान्तर गतामपि वैजयन्तीम् । पत्युस्तवेश्वरि मिथः प्रतिघात लोलाः बर्हातपत्र रुचिमारचयन्ति भृङ्गाः ॥ १४ ॥

आमोदवत्यपि सदा हृदयं गमाऽपि रागान्विताऽपि ललिताऽपि गुणोत्तराऽपि । मौलि स्रजा तव मुकुन्द किरीट भाजा गोदे भवत्यधरिता खलु वैजयन्ती ॥ १५ ॥

त्वन्मौलि दामनि विभोः शिरसा गृहीते स्वच्छन्द कल्पित सपीति रस प्रमोदाः । मञ्जु स्वना मधु लिहो विदधुः स्वयं ते स्वायंवरं कमपि मङ्गल तूर्य घोषम् ॥ १६ ॥

विश्वायमान रजसा कमलेन नाभौ वक्षःस्थले च कमला स्तन चन्दनेन । आमोदितोऽपि निगमैर्विभुरङ्घ्रि युग्मे धत्ते नतेन शिरसा तव मौलि मालाम् ॥ १७ ॥

चूडा पदेन परिगृह्य तवोत्तरीयं मालामपि त्वदलकैरधिवास्य दत्ताम् । प्रायेण रङ्गपतिरेष बिभर्ति गोदे सौभाग्य सम्पदभिषेक महाधिकारम् ॥ १८ ॥

तुङ्गैरकृत्रिम गिरः स्वयमुत्तमाङ्गैः यं सर्वगन्ध इति सादरमुद्वहन्ति । आमोदमन्यमधिगच्छति मालिकाभिः सोऽपि त्वदीय कुटिलालक वासिताभिः ॥ १९ ॥

धन्ये समस्त जगतां पितुरुत्तमाङ्गे त्वन्मौलिमाल्य भर सम्भरणेन भूयः । इन्दीवर स्रजमिवादधति त्वदीयानि आकेकराणि बहुमान विलोकितानि ॥ २० ॥

रङ्गेश्वरस्य तव च प्रणयानुबन्धात् अन्योन्य माल्य परिवृत्तिमभिष्टुवन्तः । वाचालयन्ति वसुधे रसिकास्त्रिलोकीं न्यूनाधिकत्व समता विषयैर्विवादैः ॥ २१ ॥

दूर्वा दल प्रतिमया तव देह कान्त्या गोरोचना रुचिरया च रुचेन्दिरायाः । आसीदनुञ्झित शिखावल कण्ठ शोभं माङ्गल्यदं प्रणमतां मधुवैरि गात्रम् ॥ २२ ॥

अर्च्यं समर्च्य नियमैर्निगम प्रसूनैः नाथं त्वया कमलया च समेयिवांसम् । मातश्चिरं निरविशन् निजमाधिराज्यं मान्या मनु प्रभृतयोऽपि महीक्षितस्ते ॥ २३ ॥

आर्द्रापराधिनि जनेऽप्यभिरक्षणार्थं रङ्गेश्वरस्य रमया विनिवेद्यमाने । पार्श्वे परत्र भवती यदि तत्र नासीत् प्रायेण देवि वदनं परिवर्तितं स्यात् ॥ २४ ॥

गोदे गुणैरपनयन् प्रणतापराधान् भ्रूक्षेप एव तव भोग रसानुकूलः । कर्मानुबन्धि फल दान रतस्य भर्तुः स्वातन्त्र्य दुर्व्यसन मर्म भिदा निदानम् ॥ २५ ॥

रङ्गे तटिद्गुणवतो रमयैव गोदे कृष्णाम्बुदस्य घटितां कृपया सुवृष्ट्या । दौर्गत्य दुर्विष विनाश सुधा नदीं त्वां सन्तःप्रपद्य शमयन्त्यचिरेण तापान् ॥ २६ ॥

जातापराधमपि मामनुकम्प्य गोदे गोप्त्री यदि त्वमसि युक्तमिदं भवत्याः । वात्सल्य निर्भरतया जननी कुमारं स्तन्येन वर्धयति दष्ट पयोधराऽपि ॥ २७ ॥

शतमख मणि नीला चारु कल्हार हस्ता स्तन भर नमिताङ्गी सान्द्र वात्सल्य सिन्धुः । अलक विनिहिताभिः स्रग्भिराकृष्ट नाथा विलसतु हृदि गोदा विष्णुचित्तात्मजा नः ॥ २८ ॥

इति विकसित भक्तेरुत्थितां वेङ्कटेशात् बहुगुण रमणीयां वक्ति गोदास्तुतिं यः । स भवति बहुमान्यः श्रीमते रङ्गभर्तुः चरण कमल सेवां शाश्वतीमभ्युपैष्यन् ॥ २९ ॥


॥ श्रीस्तुतिः ॥

॥ श्रीस्तुतिः ॥ 
मानातीत प्रथित विभवां मङ्गलं मङ्गलानां वक्षः पीठीं मधु विजयिनो भूषयन्तीं स्वकान्त्या । प्रत्यक्षानुश्रविक महिम प्रार्थिनीनां प्रजानां श्रेयो मूर्ति श्रियमशरणस्त्वां शरण्यां प्रपद्ये ॥ १ ॥ 

आविर्भावः कलश जलधावध्वरे वापि यस्याः स्थानं यस्याः सरसिज वनं विष्णु वक्षः स्थलं वा । भूमा यस्या भुवनमखिलं देवि दिव्यं पदं वा स्तोक प्रज्ञैरनवधि गुणा स्तूयसे सा कथं त्वम् ॥ २ ॥ 

स्तोतव्यत्वं दिशति भवती देहिभिः स्तूयमाना तामेव त्वामनितर गतिः स्तोतुमाशंसमानः । सिद्धारम्भः सकल भुवन श्लाघनीयो भवेयं सेवापेक्षा तव चरणयोः श्रेयसे कस्य न स्यात् ॥ ३ ॥ 

यत्सङ्कल्पाद्भवति कमले यत्र देहिन्यमीषां जन्म स्थेम प्रलय रचना जङ्गमाजङ्गमानाम् । तत् कल्याणं किमपि यमिनामेकलक्ष्यं समाधौ पूर्णं तेजः स्फुरति भवती पाद लाक्षा रसाङ्कम् ॥ ४ ॥ 

निष्प्रत्यूह प्रणय घटितं देवि नित्यानपायं विष्णुस्त्वं चेत्यनवधिगुणं द्वन्द्वमन्योन्य लक्ष्यम् । शेषश्चित्तं विमल मनसां मौलयश्च श्रुतीनां सम्पद्यन्ते विहरण विधौ यस्य शय्या विशेषाः ॥ ५ ॥ 

उद्देश्यत्वं जननि भजतोरुज्झितोपाधि गन्धं प्रत्यग्रूपे हविषि युवयोरेक शेषित्व योगात् । पद्मे पत्युस्तव च निगमैर्नित्यमन्विष्यमाणो नावच्छेदं भजति महिमा नर्तयन् मानसं नः ॥ ६ ॥ 

पश्यन्तीषु श्रुतिषु परितः सूरि बृन्देन सार्धं मध्ये कृत्य त्रिगुण फलकं निर्मित स्थान भेदम् । विश्वाधीश प्रणयिनि सदा विभ्रम द्यूत वृत्तौ ब्रह्मेशाद्या दधति युवयोरक्ष शार प्रचारम् ॥ ७ ॥

अस्येशाना त्वमसि जगतः संश्रयन्ती मुकुन्दं लक्ष्मीः पद्मा जलधि तनया विष्णु पत्नीन्दिरेति । यन्नामानि श्रुति परिपणान्येवमावर्तयन्तो नावर्तन्ते दुरित पवन प्रेरिते जन्म चक्रे ॥ ८ ॥ 

त्वामेवाहुः कतिचिदपरे त्वत्प्रियं लोकनाथं किं तैरन्तः कलह मलिनैः किञ्चिदुत्तीर्य मग्नैः । त्वत्सम्प्रीत्यै विहरति हरौ सम्मुखीनां श्रुतीनां भावारूढौ भगवति युवां दम्पती दैवतं नः ॥ ९ ॥ 

आपन्नार्ति प्रशमन विधौ बद्ध दीक्षस्य विष्णोः आचख्युस्त्वां प्रिय सहचरिमैकमत्योपपन्नाम् । प्रादुर्भावैरपि सम तनुः प्राध्वमन्वीयसे त्वं दूरोत्क्षिप्तैरिव मधुरता दुग्धराशेस्तरङ्गैः ॥ १० ॥ 

धत्ते शोभां हरि मरकते तावकी मूर्तिराद्या तन्वी तुङ्ग स्तनभर नता तप्त जाम्बूनदाभा । यस्यां गच्छन्त्युदय विलयैर्नित्यमानन्द सिन्धौ इच्छा वेगोल्लसित लहरी विभ्रमं व्यक्तयस्ते ॥ ११ ॥ 

आसंसारं विततमखिलं वाङ्मयं यद्विभूतिः यद् भ्रू भङ्गात् कुसुम धनुषः किङ्करो मेरु धन्वा । यस्यां नित्यं नयन शतकैरेक लक्ष्यो महेन्द्रः पद्मे तासां परिणतिरसौ भाव लेशैस्त्वदीयैः ॥ १२ ॥ 

अग्रे भर्तुः सरसिज मये भद्र पीठे निषण्णाम् अम्भो राशेरधिगत सुधा सम्प्लवादुत्थितां त्वाम् । पुष्पासार स्थगित भुवनैः पुष्कलावर्तकाद्यैः कॢप्तारम्भाः कनक कलशैरभ्यषिञ्चन् गजेन्द्राः ॥ १३ ॥ 

आलोक्य त्वाममृत सहजे विष्णु वक्षःस्थलस्थां शापाक्रान्ताः शरणमगमन् सावरोधाः सुरेन्द्राः । लब्ध्वा भूयस्त्रिभुवनमिदं लक्षितं त्वत्कटाक्षैः सर्वाकार स्थिर समुदयां सम्पदं निर्विशन्ति ॥ १४ ॥ 

आर्त त्राण व्रतिभिरमृतासार नीलाम्बुवाहैः अम्भोजानामुषसि मिषतामन्तरङ्गैरपाङ्गैः । यस्यां यस्यां दिशि विहरते देवि दृष्टिस्त्वदीया तस्यां तस्यामहमहमिकां तन्वते सम्पदोघाः ॥ १५ ॥ 

योगारम्भ त्वरित मनसो युष्मदैकान्त्य युक्तं धर्मं प्राप्तुं प्रथममिह ये धारयन्ते धनायाम् । तेषां भूमेर्धनपतिगृहादम्बरादम्बुधेर्वा धारा निर्यान्त्यधिकमधिकं वाञ्छितानां वसूनाम् ॥ १६ ॥ 

श्रेयस्कामाः कमलनिलये चित्रमाम्नाय वाचां चूडापीडं तव पद युगं चेतसा धारयन्तः । छत्र च्छाया सुभग शिरसश्चामर स्मेर पार्श्वाः श्लाघाशब्द श्रवण मुदिताः स्रग्विणः सञ्चरन्ति ॥ १७ ॥ 

ऊरीकर्तुं कुशलमखिलं जेतुमादीनरातीन् दूरीकर्तुं दुरित निवहं त्यक्तुमाद्यामविद्याम् । अम्ब स्तम्बावधिक जनन ग्राम सीमान्त रेखाम् आलम्बन्ते विमल मनसो विष्णु कान्ते दयां ते ॥ १८ ॥ 

जाताकाङ्क्षा जननि युवयोरेक सेवाधिकारे मायालीढं विभवमखिलं मन्यमानास्तृणाय । प्रीत्यै विष्णोस्तव च कृतिनः प्रीतिमन्तो भजन्ते वेलाभङ्गः प्रशमन फलं वैदिकं धर्मसेतुम् ॥ १९ ॥ 

सेवे देवि त्रिदश महिला मौलि मालार्चितं ते सिद्धि क्षेत्रं शमित विपदां सम्पदां पाद पद्मम् । यस्मिन्नीषन्नमित शिरसो यापयित्वा शरीरं वर्तिष्यन्ते वितमसि पदे वासुदेवस्य धन्याः ॥ २० ॥ 

सानुप्रास प्रकटित दयैः सान्द्र वात्सल्य दिग्धैः अम्ब स्निग्धैरमृत लहरी लब्ध सब्रह्यचर्यईः । धर्मे ताप त्र य विरचिते गाढ तप्तं क्षणं माम् आकिञ्चन्य ग्लपितमनघैरार्द्रयेथाः कटाक्षैः ॥ २१ ॥ 

सम्पद्यन्ते भव भय तमी भानवस्त्वत्प्रसादात् भावाः सर्वे भगवति हरौ भक्तिमुद्वेलयन्तः । याचे किं त्वामहमिह यतः शीतलोदार शीला भूयो भूयो दिशसि महतां मङ्गलानां प्रबन्धान् ॥ २२ ॥ 

माता देवि त्वमसि भगवान् वासुदेवः पिता मे जातः सोऽहं जननि युवयोरेकलक्ष्यं दयायाः । दत्तो युष्मत्परिजनतया देशिकैरप्यतस्त्वं किं ते भूयः प्रियमिति किल स्मेर वक्त्रा विभासि ॥ २३ ॥ 

कल्याणानामविकल निधिः काऽपि कारुण्य सीमा नित्यामोदा निगम वचसां मौलि मन्दार माला । सम्पद्दिव्या मधु विजयिनः सन्निधत्तां सदा मे सैषा देवी सकल भुवन प्रार्थना कामधेनुः ॥ २४ ॥ 

उपचित गुरु भक्तेरुत्थितं वेङ्कटेशात् कलि कलुष निवृत्त्यै कल्पमानं प्रजानाम् । सरसिज निलयायाः स्तोत्रमेतत् पठन्तः सकल कुशल सीमाः सार्वभौमा भवन्ति ॥ २५ ॥ 



॥ वैराग्य पञ्चकम् ॥

॥ वैराग्य पञ्चकम् ॥
क्षोणी कोण शतांश पालन कला दुर्वार गर्वानल- क्षुभ्यत्क्षुद्र नरेन्द्र चाटु रचना धन्यान् न मन्यामहे । देवं सेवितुमेव निश्चिनुमहे योऽसौ दयालुः पुरा दाना मुष्टिमुचे कुचेल मुनये दत्ते स्म वित्तेशताम् ॥ १ ॥

सिलं किमनलं भवेदनलमौदरं बाधितुं पयः प्रसृति पूरकं किमु न धारकं सारसम् । अयत्न मल मल्लकं पथि पटच्चरं कच्चरं भजन्ति विबुधा मुधा ह्यहह कुक्षितः कुक्षितः ॥ २ ॥

ज्वलतु जलधि क्रोड क्रीडत्कृपीड भव प्रभा- प्रतिभट पटु ज्वाला मालाकुलो जठरानलः । तृणमपि वयं सायं सम्फुल्ल मल्लि मतल्लिका परिमलमुचा वाचा याचामहे न महीश्वरान् ॥ ३ ॥

दुरीश्वर द्वार बहिर्वितर्दिका- दुरासिकायै रचितोऽयमञ्जलिः । यदञ्जनाभं निरपायमस्ति मे धनञ्जय स्यन्दन भूषणं धनम् ॥ ४ ॥

शरीर पतनावधि प्रभु निषेवणापादनात् अबिन्धन धनञ्जय प्रशमदं धनं दन्धनम् । धनञ्जय विवर्धनं धनमुदूढ गोवर्धनं सुसाधनमबाधनं सुमनसां समाराधनम् ॥ ५ ॥

नास्ति पित्रार्जितं किञ्चिन्न मया किञ्चिदार्जितम् । अस्ति मे हस्ति शैलाग्रे वस्तु पैतामहं धनम् ॥ ६ ॥


॥ सुदर्शनाष्टकम् ॥

॥ सुदर्शनाष्टकम् ॥ 

श्रीमान् वेङ्कट नाथार्यः कवितार्किक केसरी । वेदान्ता चार्य वर्योमे सन्निधत्तां सदाहृदि ॥

प्रतिभट श्रेणि भीषण वर गुण स्तोम भूषण जनिभय स्थान तारण जगदवस्थान कारण । निखिल दुष्कर्म कर्शन निगम सद्धर्म दर्शन जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्श्नन ॥ १ ॥ 

शुभ जगद्रूप मण्डन सुर गण त्रास खण्डन शत-मख ब्रह्म वन्दित शत-पथ ब्रह्म नन्दित । प्रथित विद्वत्सपक्षित भजदहिर्बुध्न्य लक्षित जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्शन ॥ २ ॥ 
स्फुट तटिज्जाल पिञ्जर पृथु-तर ज्वाल पञ्जर परिगत प्रत्न विग्रह परिमित प्रज्ञ दुर्ग्रह । प्रहरण ग्राम मण्डित परिजनत्राण पण्डित जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्श्नन ॥ ३ ॥ 

निज पद प्रीत सद्गण निरुपधि स्फीत षड्जुण निगम निर्व्यूढ वैभव निज पर व्यूह वैभव । हरि हय द्वेषि दारण हर पुर प्लोष कारण जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्श्नन ॥ ४ ॥ 

दनुज विस्तार कर्तन जनि तमिस्रा विकर्तन दनुज विद्या निकर्तन भजदविद्या निवर्तन । अमर दृष्ट स्व विक्रम समर जुष्ट भ्रमि क्रम जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्श्नन ॥ ५ ॥

 प्रतिमुखालीढ बन्धुर पृथु महा हेति दन्तुर विकट माया बहिष्कृत विविध माला परिष्कृत । पृथु महायन्त्र तन्त्रित दृढ दया तन्त्र यन्त्रित जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्श्नन ॥ ६ ॥ 

महित सम्पत्सदक्षर विहित सम्पत्षडक्षर षडर चक्र प्रतिष्टित सकल तत्व प्रतिष्टित । विविध सङ्कल्प कल्पक विबुध सङ्कल्प कल्पक जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्श्नन ॥ ७ ॥ 

भुवन नेतस्त्रयीमय सवन तेजस्त्रयीमय निरवधि स्वादु चिन्मय निखिल शक्ते जगन्मय । अमित विश्व क्रियामय शमित विष्वग्भयामय जय जय श्री सुदर्शन जय जय श्री सुदर्श्नन ॥ ८ ॥ 

द्विचतुष्कमिदं प्रभूत सारं पटतां वेङ्कटनायक प्रणीतं विषमेऽपि मनोरथः प्रधावन् न विहन्येत रथाङ्गधुर्यगुप्तः कवितार्किकसिंहाय कल्याणगुणशालिने । 

श्रीमते वेङ्कटेशाय वेदान्तगुरवे नमः ॥ 



श्री गणपती स्थापना प्राणप्रतिष्ठा पूजाविधी अभिषेक सह

🟠🚩पुजा साहित्य यादी : हळद, कुंकु, गुलाल, शेंदूर, गूळ-खोबरे, समई, नीरंजन, अष्टगंध, अक्षदा, रांगोळी, फुलवात वात, तेलवात, काडे पेटी, पळी भांड...

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