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॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॥


॥ श्रीरामरक्षास्तोत्रम् ॥

श्रीगणेशायनम: ।
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य ।बुधकौशिक ऋषि: ।
श्रीसीतारामचंद्रोदेवता ।अनुष्टुप् छन्द: ।
सीता शक्ति: ।श्रीमद्‌हनुमान् कीलकम् ।
श्रीसीतारामचंद्रप्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ॥

॥ अथ ध्यानम् ॥
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्दद्पद्‌मासनस्थं ।
पीतं वासोवसानं नवकमलदल-स्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ॥
वामाङ्‌कारूढसीता मुखकमलमिल-ल्लोचनं नीरदाभं ।
नानालङ्‌कारदीप्तं दधतमुरुजटा-मण्डनं रामचंद्रम् ॥

॥ इति ध्यानम् ॥
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशI7n jin ki utcनम् ॥१॥

ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणॊपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥

सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तं चरान्तकम् ।
स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥३॥

रामरक्षां पठॆत्प्राज्ञ: पापघ्नीं सर्वकामदाम् ।
शिरो मे राघव: पातु भालं दशरथात्मज: ॥४॥

कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रिय: श्रुती ।
घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सल: ॥५॥

जिव्हां विद्दानिधि: पातु कण्ठं भरतवंदित: ।
स्कन्धौ दिव्यायुध: पातु भुजौ भग्नेशकार्मुक: ॥६॥

करौ सीतापति: पातु हृदयं जामदग्न्यजित् ।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रय: ॥७॥

सुग्रीवेश: कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभु: ।
ऊरू रघुत्तम: पातु रक्ष:कुलविनाशकृत् ॥८॥

जानुनी सेतुकृत्पातु जङ्‌घे दशमुखान्तक: ।
पादौ बिभीषणश्रीद: पातु रामोSखिलं वपु: ॥९॥

एतां रामबलोपेतां रक्षां य: सुकृती पठॆत् ।
स चिरायु: सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥१०॥

पातालभूतलव्योम चारिणश्छद्‌मचारिण: ।
न द्र्ष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभि: ॥११॥

रामेति रामभद्रेति रामचंद्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापै भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥१२॥

जगज्जेत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
य: कण्ठे धारयेत्तस्य करस्था: सर्वसिद्द्दय: ॥१३॥

वज्रपंजरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अव्याहताज्ञ: सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥१४॥

आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हर: ।
तथा लिखितवान् प्रात: प्रबुद्धो बुधकौशिक: ॥१५॥

आराम: कल्पवृक्षाणां विराम: सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां राम: श्रीमान् स न: प्रभु: ॥१६॥

तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ ।
पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥

फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ ।
पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥

शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
रक्ष:कुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघुत्तमौ ॥१९॥

आत्तसज्जधनुषा विषुस्पृशा वक्षया शुगनिषङ्ग सङि‌गनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणा वग्रत: पथि सदैव गच्छताम् ॥२०॥

संनद्ध: कवची खड्‌गी चापबाणधरो युवा ।
गच्छन्‌मनोरथोSस्माकं राम: पातु सलक्ष्मण: ॥२१॥

रामो दाशरथि: शूरो लक्ष्मणानुचरो बली ।
काकुत्स्थ: पुरुष: पूर्ण: कौसल्येयो रघुत्तम: ॥२२॥

वेदान्तवेद्यो यज्ञेश: पुराणपुरुषोत्तम: ।
जानकीवल्लभ: श्रीमानप्रमेय पराक्रम: ॥२३॥

इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्‌भक्त: श्रद्धयान्वित: ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं संप्राप्नोति न संशय: ॥२४॥

रामं दूर्वादलश्यामं पद्‌माक्षं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नामभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नर: ॥२५॥

रामं लक्ष्मण पूर्वजं रघुवरं सीतापतिं सुंदरम् ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथनयं श्यामलं शान्तमूर्तिम् ।
वन्दे लोकभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥२६॥

रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे ।
रघुनाथाय नाथाय सीताया: पतये नम: ॥२७॥

श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम । श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम । श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥

श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि ।
श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि । श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२९॥

माता रामो मत्पिता रामचंन्द्र: । स्वामी रामो मत्सखा रामचंद्र: ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालु । नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा ।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुनंदनम् ॥३१॥

लोकाभिरामं रनरङ्‌गधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।
कारुण्यरूपं करुणाकरंतं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥

कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥३४॥

आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसंपदाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५॥

भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसंपदाम् ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥

रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे ।
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम: ।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोSस्म्यहम् ।
रामे चित्तलय: सदा भवतु मे भो राम मामुद्धर ॥३७॥

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥


इति श्रीबुधकौशिकविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम



श्रीरामस्तुति

श्रीरामस्तुति

 

संसारसंगे बहु शीणलों मी। कृपा करी रे रघुराजस्वामी। प्रारब्ध माझें सहसा टळेना। तुजवीण रामा मज कंठवेना ॥१॥ मन हे विकारी स्थिरता न ये रे। त्याचेनि संगें भ्रमतें भलें रे । अपूर्व कार्या मन हैं विटेना । तुजवीण रामा मज कंठवेना ॥२॥ माया प्रपंच बहु गुंतलों रे। विशाळ व्याधीमध्ये बांधलों रे। देहाभिमानें अति राहवेना । तुजवीण रामा मज कंठवेना ॥३॥ दारिद्र्यदुःखें बहु कष्टलों मी । संसारमायेंतचि गुंतलों मी।संगीत माझे मजला कळेना। तुजवीण रामा मज कंठवेना ॥४ ॥ लक्ष्मीविलासी बहु सौख्य वाटे। श्रीराम ध्यातांमनिं कष्ट मोठे। प्रपंचवार्ता वदतां विटेना। तुजवीण रामा मज कंठवेना ॥५॥ अहोरात्र धंदा करिता पुराना। प्रारब्धयोगें मज राहवेना। भवदुःख माझे कधिंही टळेना। तुजवीण रामा मज कंठवेना॥६॥ तीर्थासी जातां बहु दुःख वाटे। विषयांतर राहुनि सौख्य वाटे। स्वहित माझें मजला कळेना। तुजवीण रामा मज कंठवेना ।॥७॥ मी कोठुनी कोण आलों कसा स्त्रीपुत्रस्वप्नांतचि गुंतलो हो। ऐसें कळोनी मन हें विटेना । तुजवीण रामा मज कंठवेना ॥८॥ असत्य वाक्यांनि मुकाच झालों। अदत्तदोषें दुःखीं बुडालों। अपूर्व करणी कशी आठवेना । तुजवीण रामा मज कंठवेना ॥९॥ब्रह्ममूर्ती भजन रामसिंधू। चैतन्य स्वामी दीनबंधु । अभ्यंतरी प्रेम मनी ठसेना। तुजवीण रामा मज कंठवेना ॥१०॥ विश्रांति देहीं अणुमात्र नाही। कुलाभिमान पडलों प्रवाहीं। अशांतुनी दूर कधीं कळेना। तुजवीण रामा मज कंठवेना ॥११॥ विषयी जनांनीं मज आळवीलें। प्रपंचपाशांतचि बूडवीलें। स्वहित माझें मजला दिसेना । तुजवीण रामा मज कंठवेना ॥१२॥नरदेहदोषां वर्णू किती रे। उच्चाट माझे मनिं वाटती रे। लल्लाटरेषा कधिं पालटेना । तुजवीण रामा मज कंठवेना ॥१३॥ मजला अनाथा प्रभु तूंचि दाता। मी मूढ की जाण असेंचि आतां । दासा मनीं आठव वीसरेना। तुजवीण रामा मज कंठवेना ॥१४॥

 


मागणी आणि प्रार्थना उत्तम गुण मज दे रामा

मागणी आणि प्रार्थना

 

उत्तम गुण मज दे रामा

पावन भिक्षा दे रामा । दीनदयाळा दे रामा ॥१॥

अभेद भक्ती दे रामा। अश्वारोहण दे रामा ॥२ ॥ 

तद्रुपता मज देरामा। आत्मनिवेदन दे रामा ॥३ ॥ 

सजनसंगति दे रामा अलिप्तपण मज दे रामा ॥४॥ 

अंतरपारख दे राम । बहुजनमैत्री देरामा॥८॥

ब्रह्मानुभव मज देरामा। अनन्यसेवा दे रामा ॥५॥ 

कोमल वाचा दे रामा। विमल करणी दे रामा ॥६॥

प्रसंगवोळखी देरामा। धूर्तकळा मज देरामा॥७॥

हितकारक ते देरामा। जनसुखकारी दे रामा ॥९ ॥

विद्यावैभव दे रामा। उदासीनता दे रामा ॥१० ॥

मागो नेणे दे रामा। मज न कळे ते देरामा ॥११॥ 

सावधपण मज दे रामा । बहु पाठांतर दे रामा ॥१२॥

दास म्हणे रे गुणाधामा । उत्तम गुण मज दे रामा ॥१३

 


|| आरती श्री रामचन्द्र जी की ||

|| आरती श्री रामचन्द्र जी की ||

 

श्री रामचन्द्र कृपालु भजुमन हरण भव भय दारुणम् । 

नव कज्ज लोचन कंज मुख कर, कञ्ज पद कञ्जारुणम् ।। 

कन्दर्प अगणित अमित छबि नव नील नीरज सुन्दरम्। 

पट पीत मानहुं तडित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरम् ।। 

भजु दीनबंधु दिनेश दानव दैत्य वंश निकन्दम् ।। 

रघुनन्द आनन्द कन्द कौशल चन्द दशरथ नन्दनम्।। 

सिर मुकुट कुण्डल तिलक चारू उदार अंग विभूषणम् ।

आजानु भुज सर चाप धर, संग्राम जित खरदूषणम् ।। 

इति वदति तुलसीदास शंकर शेष मुनि मन रंजनम्।।

 मम हृदय कंज निवास करू कामादि खल दल गंजनम् ।। 

मन जाहि राच्यो मिलहि सो बर सहज सुन्दर सांवरो । 

करूणा निधान सुजान शील, सनेह जानत रावरो ।। 

एही भांति गौरि अशीष सुनि, सिय सहित हियं हर्षित अली ।

तुलसी भवानिहि पूजि पुनि-पुनि, मुदित मन मन्दिर चली । 

दो.-जानि गौरी अनुकूल, सिर हिय हर्ष न जाई कहि । 

मंजुल मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे ।।

 


श्री राम चालीसा

श्री राम चालीसा

दोहा

गणपति चरण सरोज गहि । चरणोदक धरि भाल ।।
लिखौं विमल रामावली । सुमिरि अंजनीलाल ।।
राम चरित वर्णन करौं । रामहिं हृदय मनाई ।।
मदन कदन रत राखि सिर । मन कहँ ताप मिटाई ।।

चौपाई
राम रमापति रघुपति जै जै । महा लोकपति जगपति जै जै ।।
राजित जनक दुलारी जै जै । महिनन्दिनी प्रभु प्यारी जै जै ।।
रातिहुं दिवस राम धुन जाहीं । मगन रहत मन तन दुख नाहीं ।।
राम सनेह जासु उर होई । महा भाग्यशाली नर सोई ।।
राक्षस दल संहारी जै जै । महा पतित तनु तारी जै जै ।।
राम नाम जो निशदिन गावत । मन वांछित फल निश्चय पावत ।।
रामयुधसर जेहिं कर साजत । मन मनोज लखि कोटिहुं लाजत ।।
राखहु लाज हमारी जै जै । महिमा अगम तुम्हारी जै जै ।।
राजीव नयन मुनिन मन मोहै । मुकुट मनोहर सिर पर सोहै ।।
राजित मृदुल गात शुचि आनन । मकराकृत कुण्डल दुहुँ कानन ।।
रामचन्द्र सर्वोत्तम जै जै । मर्यादा पुरुषोत्तम जै जै ।।
राम नाम गुण अगन अनन्ता । मनन करत शारद श्रुति सन्ता ।।
राति दिवस ध्यावहु मन रामा । मन रंजन भंजन भव दामा ।।
राज भवन संग में नहीं जैहें । मन के ही मन में रहि जैहें ।।
रामहिं नाम अन्त सुख दैहें । मन गढ़न्त गप काम न ऐहें ।।
राम कहानी रामहिं सुनिहें । महिमा राम तबै मन गुनिहें ।।
रामहि महँ जो नित चित राखिहें । मधुकर सरिस मधुर रस चाखिहें ।।
राग रंग कहुँ कीर्तन ठानिहें । मम्ता त्यागि एक रस जानिहें ।।
.राम कृपा तिन्हीं पर होईहें । मन वांछित फल अभिमत पैहें ।।
राक्षस दमन कियो जो क्षण में । महा बह्नि बनि विचर्यो वन में ।।
रावणादि हति गति दै दिन्हों । महिरावणहिं सियहित वध कीन्हों ।।
राम बाण सुत सुरसरिधारा । महापातकिहुँ गति दै डारा ।।
राम रमित जग अमित अनन्ता । महिमा कहि न सकहिं श्रुति सन्ता ।।
राम नाम जोई देत भुलाई । महा निशा सोइ लेत बुलाई ।।
राम बिना उर होत अंधेरा । मन सोही दुख सहत घनेरा ।।
रामहि आदि अनादि कहावत । महाव्रती शंकर गुण गावत ।।
राम नाम लोहि ब्रह्म अपारा । महिकर भार शेष सिर धारा ।।
राखि राम हिय शम्भु सुजाना । महा घोर विष किन्ह्यो पाना ।।
रामहि महि लखि लेख महेशु । महा पूज्य करि दियो गणेशु ।।
राम रमित रस घटित भक्त्ति घट । मन के भजतहिं खुलत प्रेम पट ।।
राजित राम जिनहिं उर अन्तर । महावीर सम भक्त्त निरन्तर ।।
रामहि लेवत एक सहारा । महासिन्धु कपि कीन्हेसि पारा ।।
राम नाम रसना रस शोभा । मर्दन काम क्रोध मद लोभा ।।
राम चरित भजि भयो सुज्ञाता । महादेव मुक्त्ति के दाता ।।
रामहि जपत मिटत भव शूला । राममंत्र यह मंगलमूला ।।
राम नाम जपि जो न सुधारा । मन पिशाच सो निपट गंवारा ।।
राम की महिमा कहँ लग गाऊँ । मति मलिन मन पार न पाऊँ ।।
रामावली उस लिखि चालीसा । मति अनुसार ध्यान गौरीसा ।।
रामहि सुन्दर रचि रस पागा । मठ दुर्वासा निकट प्रयागा ।।
रामभक्त्त यहि जो नित ध्यावहिं । मनवांछित फल निश्चय पावहिं ।।

दोहा
राम नाम नित भजहु मन । रातिहुँ दिन चित लाई ।।
मम्ता मत्सर मलिनता । मनस्ताप मिटि जाई ।।
राम का तिथि बुध रोहिणी । रामावली किया भास ।।
मान सहस्त्र भजु दृग समेत । मगसर सुन्दरदास ।।

 

 


रामाची कर्पूरआरती

रामाची कर्पूरआरती

धूप दीप झाला आता कर्पूर आरती । रामा कर्पूर आरती ॥
छत्र सिंहासनी बैसले जानकीपती । बैसले अयोध्यानृपती ॥ धृ ॥


कर्पूरवडीसम मानस माझे निर्मळ राहू दे । रामा निर्मळ राहू दे ॥
कर्पूरवडीचा भावभक्तिचा सुगंध वाहू दे । रामा सुगंध वाहू दे ॥
कर्पूरवडीची लावून ज्योत, पाहीन तव मूर्ति । रामा पाहीन तव मूर्ति ॥
छत्र सिंहासनी बैसले जानकीपती । बैसले अयोध्यानृपती ॥ १ ॥

ध्यान कळेना,ज्ञान कळेना ना कळे काही । रामा ना कळे काही ॥
शब्दरूपी गुंफ़ुनि माला वाहतो पायी । रामा वाहतो पायी ॥
मुखी नाम, नेत्री ध्यान, हृदयी तव मूर्ति । रामा हृदयी तव मूर्ति ॥
छत्र सिंहासनी बैसले जानकीपती । बैसले अयोध्यानृपती ॥२ 
॥ 

 


|| अहल्याकृतं रामस्तोत्रम्‌ ||

|| अहल्याकृतं रामस्तोत्रम्‌ || 

अहल्योवाचः
अहो कृतार्थाऽस्मि जगन्निवास ते पादाब्जसँल्लग्नरजः कणादहम्‌ ।
स्पृशामि यत्पद्म जशंकरादिभिर्विमृग्यते रन्धितमानसैः सदा ॥१॥

अहो विचित्रं तव राम चेष्टितं मनुष्यभावेन विमोहितं जगत्‌ ।
चलस्यजस्रं चरणादिवर्जितः संपूर्ण आनन्दमयोऽतिमायिकः ॥२॥

यत्पादपंकजपरागपवित्रगात्रा भागीरथी भवविरिंचिमुखान्पुनाति ।
साक्षात्स एव मम दृग्विषयो यदास्ते किं वर्ण्यते मम पुराकृतभागघेयम्‌ ॥३॥

मर्त्यावतारे मनुजाकृतिं हरिं रामाभिधेयं रमणीयदेहिनम्‌ ॥
धनुर्धरं पद्मविशाललोचनं भजामि नित्यं न परान्‌ भजिष्ये ॥४॥

यत्पादपंकरजःश्रुतिभिर्विमृग्यं यन्नाभिपंकजभवः कमलासनश्च ।
यन्नामसाररसिको भगवान्पुरारिस्तं रामचन्द्रमनिशं हृदि भावयामि ॥५॥

यस्यावतारचरितानि विरिंचिलोके गायन्ति नारदमुखा भवपद्मजाद्माः ।
आनन्दजाश्रुपरिषिक्तकुचाग्रसीमा वागीश्वरी च तमहं शरणं प्रपद्मे ॥६॥

सोऽयं परात्मा पुरुषः पुराण एषः स्वयं ज्योतिरनन्त आद्यः ।
मायातनुं लोकविमोहनीयां धत्ते परानुग्रह एष रामः ॥७॥

अयं हि विश्वोद्भवसंयमानामेकः स्वमायागुणबिम्बितो यः ।
विरिंचिविष्णवीश्वरनामभेदान्‌ धत्ते स्वतन्त्रः परिपूर्ण आत्मा ॥८॥

नमोऽस्तु ते रात तवांघ्रिपंकजं श्रिया धृतं वक्षसि लालितं प्रियात्‌ ।
आक्रान्तमेकेन जगत्त्रयं पुरा ध्येयं मुनीन्द्रैरभिमानवर्जितैः ॥९॥

जगतामादिभूतस्त्वं जगत्त्वं जगदाश्रयः ।
सर्वभूतेध्वसंबद्ध एको भाति भवान्परः ॥१०॥

ॐकारवाच्यस्त्वं राम वाचामविषयः पुमान्‌ ।
वाच्यवाचकभेदेन भवानेव जगन्मयः ॥११॥

कार्यकारणकर्तृत्वसफलेसाधनभेदतः ।
एको बिभासि रामस्त्वंमायया बहुरुपया ॥१२॥

त्वन्मायामोहितधियसत्वां न जानन्ति तत्वतः ।
मानुषं त्वाऽभिमन्यते मायिनं परमेश्वरम्‌ ।१३॥

आकाशवत्त्वं सर्वत्र बहिरन्तर्गतोऽमलः ।
असंगो ह्यचलो नित्यः शुद्धो बुद्धः सदव्ययः ॥१४॥

योषिन्मूढाऽहमज्ञा ते तत्वं जाने कथं विभो ।
तस्मात्ते शतशो राम नमस्कुर्यामनन्यधीः ॥१५॥

देव में यत्र कुत्रापि स्थिताया अपि सर्वदा ।
त्वत्पादकमले सक्ता भक्तिरेव सदाऽस्तु मे ॥१६॥

नमस्ते पुरुषाध्यक्ष नमस्ते भक्तवत्सल ।
नमस्तेऽस्तु हृषीकेश नारायण नमोऽस्तु ते ॥१७॥

भवभयहरमेकं भानुकोटिप्रकाशं करधृतशरचापं कालमेघावभासम्‌ ।
कनकरुचिरवस्त्रं रत्नवत्कुण्डलाढयं कमलविशदनेत्रं सानुजं राममीडे ॥१८॥

स्तुत्वैवं पुरुषं साक्षाद्राघवं पुरतः स्थितम्‌ ।
परिक्रम्य प्रणम्याशु सानुज्ञाता ययौ पतिम्‌ ॥१९॥

अहल्यया कृतं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिसंयुतः ।
स मुच्यतेऽखिलैः पापैः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥२०॥

पुत्रार्थे यः पठेद्भक्त्या रामः हृदि निधाय च ।
संवत्सरेण लभते वन्ध्या अपि सुपुत्रकम्‌ ॥२१॥

सर्वान्कामानवाप्नोति रामचन्द्रप्रसादतः 
ब्रह्मघ्नो गुरुतल्पगोऽपि पुरुषः स्तेयी सुरापोऽपि वा 
॥२२॥

मातृभ्रातृविहिंसकोऽपि सततं भोगैकबद्धातुरः ।
नित्यं स्तोत्रमिदं जपन्‌ रघुपतिं भक्त्या हृदिस्थं स्मरन्‌
ध्यायन्मुक्तिमुपैति किं पुनरसौ स्वाचारयुक्तो नरः ॥२३॥

॥ इति श्रीमद्ध्यात्मरामायणे अहल्याविरचितं रामचन्द्रस्तोत्रम्‌।

|| परशुरामस्तोत्रम ||

|| परशुरामस्तोत्रम ||
|| कराभ्यां परशुं चापं दधानं रेनुकात्मजम || 
|| जामदग्न्यं भजे रामं भार्गवं क्षत्रियान्तकम || १ || 
|| नमामि भार्गवं रामं रेणुकाचित्तनंदनम ||
|| मोचिताम्बार्तिमुत्पातनाशनं क्षत्रनाशनं || २ ||
|| भयार्तस्वजनत्राणतत्परं धर्मतत्परम ||
|| गतवर्गप्रियं शूरं जमदग्निसुतं मतम || ३ ||    
|| वशीकृतमहादेवं दृप्तभूपकुलान्तकम ||
|| तेजस्विनं कार्तवीर्यनाशनं भवनाशनम || ४ ||
|| परशुं दक्षिणे हस्ते वामे च दधतं धनुः ||
|| रम्यं भृगुकुलोत्तंसं घनश्यामं मनोहरम || ५ ||
|| शुद्धं बुद्धं महाप्रज्ञामंडितं रणपण्डितं ||
|| रामं श्रीदत्तकरुणाभाजनं विप्ररंजनं || ६ ||
|| मार्गणाशोषिताब्ध्यंशं पावनं चिरजीवनं ||
|| य एतानि जपेद्रामनामानि स कृती भवेत || ७ ||

इति श्री प.प. वासुदेवानंदसरस्वती विरचितं श्रीपरशुरामस्तोत्रं संपूर्णम

पावन भिक्षा दे रे राम |

पावन भिक्षा दे रे राम | दिनदयाळा दे रे राम ||१||

अभेद भक्ती दे रे राम | आत्मनिवेदन दे रे राम ||२||

सद्विद्या मज दे रे राम | अर्थारोहण दे रे राम ||३||

सज्जन संगती दे रे राम | अलिप्तपण मज दे रे राम ||४||

ब्रह्म अनुभव दे रे राम | अनन्य सेवा दे रे राम ||५||

कोमल वाचा दे रे राम | विमलकरणी दे रे राम ||६||

प्रसंग ओळखी दे रे राम | धूर्त कला मज दे रे राम ||७||

हितकारक मज दे रे राम | जन सुखकारक दे रे राम ||८||

अंतरपारखी दे रे राम | बहुजन मैत्री दे रे राम ||९||

ज्ञान वैभव दे रे राम | उदासिनता दे रे राम ||१०||

मागो नेणे ते दे रे राम | मज न कळे ते दे रे राम ||११||

तुझी आवडी दे रे राम | दास म्हणे ते दे रे राम ||१२||

शब्द मनोहर दे रे राम | सावध पण मज दे रे राम ||१३||

दास म्हणे रे गुणधामा | उत्तम गुण
मज दे रामा ||१४||

पावन भिक्षा दे रे राम | दिन दयाळा दे रे राम ||१५||

श्रीरामचंद्राची आरती (उत्कट साधुनि)

श्रीरामचंद्राची आरती 

उत्कट साधुनि शिळा सेतू बांधोनी।
लिंगदेह-लंकापुरि विध्वंसूनी ॥
कामक्रोधादिक राक्षस मर्दूनी ।
देह-अहंभाव रावण निवटोनी ॥ १ ॥

जय एव जय देव निजबोधा रामा।
परमार्थे आरती सदभावें आरती परिपूर्णकामा ॥ धृ० ॥

प्रथम सीताशुद्धी हनुमंत गेला ।
लंका दहन करुनी अखया मारिला ॥
मारिला जंबूमाळी बुवनीं त्राहाटीला।
आनंदाची गुढी घेउनियां अला ॥ जय० ॥ २ ॥

निजबळे निजशक्ति सोडविली सीता।
म्हणुनी येणे झालें आयोध्यें रघुनाथा ॥
आनंदे वोसंडे वैराग्य भरता।
आरती घेउनी आली कौसल्या माता ॥ जय० ॥ ३ ॥

अनुहतवादित्रध्वनि गर्जति अपार।
अठरा पदमे वानर करिती भुभुःकार ॥
अयोध्येसी आले दशरथकुमार।
नगरी होत आहे आनंद थोर ॥ जय० ॥ ४ ॥

सहज सिंहासनीं राजा रघुवीर ।
सोहंभावें तया पूजा उपचार ॥
सहजांची आरती वाद्यांचा गजर ।
माधवदासा स्वामी आठवे ना विसर ॥ जय० ॥ ५ ॥

आरती रामाची 2 (त्रिभुवन मंडीतमाळ शोभतो गळा )


आरती रामाची

त्रिभुवन मंडीतमाळ शोभतो गळा (२)
आरती ओवाळू पाहू ब्रम्ह पुतळा (२)
बोलो श्रीराम जयराम जयजय राम (२)
आरती ओवाळू पाहू सुंदर मेघश्याम (२)
ठकारांचे ठाण करी धनुष्य बाण (२)
मारूती सन्मुख उभा कर जोडून (२)
भरत शत्रूघन दोघे चौ-या ढाळीती (२)
स्वर्गीहून देव पुष्पवृष्टी करीता (२)
रत्नस्वचित माणिक वर्ण काय मुकूटी (२)
आरती ओवाळू चौदा भुवनाच्या पोटी (२)
विष्णूदास नामा म्हणे मागतो तू दे(२)
आरती ओवाळू पाहू सितापतीते (२)


श्री गणपती स्थापना प्राणप्रतिष्ठा पूजाविधी अभिषेक सह

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