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|| श्री व्यंकटेश स्तोत्र || २

श्री व्यंकटेश स्तोत्र 

श्री गणेशाय नम: | श्री व्यंकटशाय नम: ||
ॐ नमो जी हेरंबा | सकळादि तू प्रारंभा | आठवूनी तुझी स्वरूपशोभा | वंदन भावे करीतसे || १ || नमन माझे हंसवाहिनी | वाग्वरदे विलासिनी | ग्रंथ वदावया निरुपणी | भावार्थखाणी जयामाजी || २ || नमन माझे गुरुवर्या | प्रकाशरूपा तू स्वामिया | स्फूर्ति द्यावी ग्रंथ वदावया | जेणे श्रोतया सुख वाटे || ३ || नमन माझे संतसज्जना | आणि योगिया मुनिजना | सकळ श्रोतया साधुजना | नमन माझे साष्टांगी || ४ || ग्रंथ ऐका प्रार्थनाशतक | महादोषांसी दाहक | तोषुनिया वैकुंठनायक | मनोरथ पूर्ण करील || ५ || जयजयाजी व्यंकटरमणा | दयासागरा परिपूर्णा | परंज्योती प्रकाशगहना | करितो प्रार्थना श्रवण कीजे || ६ || जननीपरी त्वां पाळिले | पितयापरी त्वां सांभाळिले | सकळ संकटांपासुनि रक्षिले | पूर्ण दिधले प्रेमसुख || ७ || हे अलोलिक जरी मानावे | तरी जग हे सृजिले आघवे | जनक जननीपण स्वभावें | सहज आले अंगासी || ८ || दीननाथा प्रेमासाठी | भक्त रक्षिले संकटी | प्रेम दिधले अपूर्व गोष्टी | भजनासाठी भक्तांच्या || ९ || आता परिसावी विज्ञापना | कृपाळुवा लक्ष्मीरमणा | मज घालोनि गर्भाधाना | अलोलिक रचना दाखविली || १० || तुज न जाणता झालो कष्टी | आता दृढ तुझे पायी घातली मिठी | कृपाळुवा जगजेठी | अपराध पोटी घाली माझे || ११ || माझिया अपराधांच्या राशी | भेदोनी गेल्या गगनासी | दयावंता हृषीकेशी | आपुल्या ब्रीदासी सत्य करी || १२ || पुत्राचे सहस्र अपराध | माता काय मानी तयाचा खेद | तेवी तू कृपाळू गोविंद | मायबाप मजलागी || १३ || उडदांमाजी काळेगोरे | काय निवडावे निवडणारे | कुचलिया वृक्षांची फळे | मधुर कोठोनी असतील || १४ || अराटीलागी मृदुता | कोठोनी असेल कृपावंता | पाषाणासी गुल्मलता | कैशियापरी फुटतील || १५ || आपादमस्तकावरी अन्यायी | परी तुझे पदरी पडिलो पाही | आता रक्षण नाना उपायी | करणे तुज उचित || १६ || समर्थांचे घरीचे श्र्वान | त्यासी सर्वही देती मान | तैसा तुझा म्हणवितो दीन | हा अपमान कवणाचा || १७ || लक्ष्मी तुझे पायांतळी | आम्ही भिक्षेसी घालोनी झोळी | येणे तुझी ब्रीदावळी | कैसी राहील गोविंदा || १८ || कुबेर तुझा भांडारी | आम्हां फिरविसी दारोदारी | यात पुरुषार्थ मुरारी | काय तुजला पै आला || १९ || द्रौपदीसी वस्त्रे अनंता | देत होतासी भाग्यवंता | आम्हांलागी कृपणता | कोठोनी आणिली गोविंदा || २० || मावेची करुनी द्रौपदी सती | अन्ने पुरविली मध्यराती | ऋषीश्र्वरांच्या बैसल्या पंक्ती | तृप्त केल्या क्षणमात्रे || २१ || अन्नासाठी दाही दिशा | आम्हां फिरविसी जगदीशा | कृपाळुवा परमपुरुषा | करुणा कैशी तुज न ये || २२ || अंगीकारी या शिरोमणि | तुज प्रार्थितो मधुर वचनी | अंगीकार केलिया झणी | मज हातींचे न सोडावे || २३ || समुद्रे अंगीकारीला वडवानळ | तेणे अंतरी होतसे विहवळ | ऐसे असोनी सर्वकाळ | अंतरी साठविला तयाने || २४ || कूर्मे पृथ्वीचा घेतला भार | तेणे सोडीला नाही बडिवार | एवढा ब्रम्हांडगोळ थोर | त्याचा अंगीकार पै केला || २५ || शंकरे धरिले हाळाहळा | तेणे नीळवर्ण झाला गळा | परी त्यागिले नाही गोपाळा | भक्तवत्सला गोविंदा || २६ || माझ्या अपराधांच्या परी | वर्णिता शिणली वैखरी | दृष्ट पतीत दुराचारी | अधमाहुनि अधम || २७ || विषयासक्त मंदमति आळशी | कृपण कुव्यसनी मलिन मानसी | सदा सर्वकाळ सज्जनांशी | द्रोह करी सर्वदा || २८ || वचनोक्ति नाही मधुर | अत्यंत जनांसी निष्ठुर | सकळ पामरांमाजी पामर | व्यर्थ बडिवार जगी वाजे || २९ || काम क्रोध मद मत्सर | हे शरीर त्यांचे बिढार | कामकल्पनेसी थार | दृढ येथे केला असे || ३० || अठरा भार वनस्पतींची लेखणी | समुद्र भरला मषीकरुनी | माझे अवगुण लिहिता धरणी | तरी लिहिले न जाती || ३१ || ऐसा पतित मी खरा | परी तू पतितपावन शारद्गधरा | तुवा अंगीकार केलिया गदाधरा | कोण दोषगुण गणील || ३२ || नीच रतली रायाशी | तिसी कोण म्हणेल दासी | लोह लागता परिसासी | पूर्वास्थिती मग कैंची || ३३ || गावीचे होते लेंडवोहळ | गंगेसी मिळता गंगाजळ | कागविष्ठेचे झाले पिंपळ | तयांसी निद्य कोण म्हणे || ३४ || तसा कुजाति मी अमंगळ | परी तुझा म्हणवितो केवळ | कन्या देऊनिया कुळ | मग काय विचारावे || ३५ || जाणत असता अपराधी नर | तरी का केला अंगीकार | अंगीकारावरी अव्हेर | समर्थे न केला पाहिजे || ३६ || धाव पाव रें गोविंदा | हाती घेवोनिया गदा | करी माझ्या कर्माचा चेंदा | सच्चिदानंदा श्रीहरी || ३७ || तुझिया नामाची अपरिमित शक्ति | तेथें माझी पापे किती | कृपाळुवा लक्ष्मीपती | बरवे चित्ती विचारी || ३८ || तुझे नाम पतितपावन | तुझे नाम कलिमलदहन | तुझे नाम भवतारण | संकटनाशन नाम तुझे || ३९ || आता प्रार्थना ऐके कमळापती | तुझे नामी राहे माझी मती | हेचि मागतो पुढतपुढती | परंज्योती व्यंकटेशा || ४० || तू अनंत तुझी अनंत नामे | तयांमाजी अति सुगमे | ती मी अल्पमति प्रेमे | स्मरूनी प्रार्थना करीतसे || ४१ || श्रीव्यंकटेशा वासुदेवा | प्रद्युमन्ना अनंता केशवा | संकर्षणा श्रीधरा माधवा | नारायणा आदिमूर्ते || ४२ || पद्मनाभा दामोदरा | प्रकाशगहना परात्परा | आदिअनादि विश्वंभरा | जगदुद्धारा जगदीशा || ४३ || कृष्णा विष्णो हृषीकेशा | अनिरुद्धा पुरुषोत्तमा परेशा | नृसिंह वामन भार्गवेशा | बौद्ध कलंकी निजमूर्ती || ४४ || अनाथरक्षका आदिपुरुषा | पूर्णब्रम्ह सनातन निर्दोषा | सकळ मंगळ मंगळाधीशा | सज्जनजीवना सुखमूर्ते || ४५ || गुणातीता गुणज्ञा | निजबोधरूपा निमग्ना | शुद्ध सात्विका सुज्ञा | गुणप्राज्ञा परमेश्वरा || ४६ || श्रीनिधीश्रीवत्सलांछन धरा | भयकृद्भयनाशना गिरीधरा | दृष्टदैत्यसंहारकरा | वीर सुखकरा तू एक || ४७ || निखिल निरंजन निर्विकारा | विवेकखाणी- वैरागरा | मधुमुरदैत्यसंहारकरा | असुरमर्दना उग्रमुर्ते || ४८ || शंखचक्रगदाधरा | गरुडवाहना भक्तप्रियकरा | गोपीमनरंजना सुखकरा | अखंडित स्वभावे || ४९ || नानानाटक - सूत्रधारिया | जगद्व्यापका जगद्वर्या| कृपासमुद्रा करुणालया | मुनिजनध्येया मूळमूर्ति || ५० || शेषशयना सार्वभौमा | वैकुंठवासिया निरुपमा | भक्तकैवारिया गुणधामा | पाव आम्हां ये समयी || ५१ || ऐसी प्रार्थना करुनी देवीदास | अंतरी आठविला श्रीव्यंकटेश | स्मरता हृदयी प्रकटला ईश | त्या सुखासी पार नाही || ५२ || हृदयी आविर्भवली मूर्ति | त्या सुखाची अलोलिक स्थिती | आपुले आपण श्रीपती | वाचेहाती वदवीतसे || ५३ || ते स्वरूप अत्यंत सुंदर | श्रोती श्रवण कीजे सादर | सावळी तनु सुकुमार | कुंकुमाकार पादपद्मे || ५४ || सुरेख सरळ अंगोळिका | नखे जैसी चंद्ररेखा | घोटीव सुनीळ अपूर्व देखा | इंद्रनिळाचियेपरी || ५५ || चरणी वाळे घागरिया | वाकी वरत्या गुजरिया | सरळ सुंदर पोटरिया | कर्दळीस्तंभाचियेपरी || ५६ || गुडघे मांडिया जानुस्थळ | कटितटि किंकिणी विशाळ | खालते विश्वंउत्पत्तिस्थळ | वरी झळाळे सोनसळा || ५७ || कटीवरते नाभिस्थान | जेथोनि ब्रम्हा झाला उत्पन्न | उदरी त्रिवळी शोभे गहन | त्रैलोक्य संपूर्ण जयामाजी || ५८ || वक्ष:स्थळी शोभे पदक | पाहोनी चंद्रमा अधोमुख | वैजयंती करी लखलख | विद्युल्लतेचियेपरी || ५९ || हृदयी श्रीवत्सलांछन | भूषण मिरवी श्रीभगवान | तयावरते कंठस्थान | जयासी मुनिजन अवलोकिती || ६० || उभय बाहुदंड सरळ | नखे चंद्रापरीस तेजाळ | शोभती दोन्ही करकमळ | रातोत्पलाचियेपरी || ६१ || मनगटी विराजती कंकणे | बाहुवटी बाहुभूषणे | कंठी लेइली आभरणे | सूर्यकिरणे उगवली || ६२ || कंठावरुते मुखकमळ | हनुवटी अत्यंत सुनीळ | मुखचंद्रमा अति निर्मळ | भक्तस्नेहाळ गोविंदा || ६३ || दोन्ही अधरांमाजी दंतपंक्ती | जिव्हा जैसी लावण्यज्योती | अधरामृतप्राप्तीची गती | ते सुख जाणे लक्ष्मी || ६४ || सरळ सुंदर नासिक | जेथे पवनासी झाले सुख | गंडस्थळीचे तेज अधिक | लखलखीत दोन्ही भागी || ६५ || त्रिभुवनीचे तेज एकटवले | बरवेपण शिगेसी आले | दोन्ही पातयांनी धरिले | तेज नेत्र श्रीहरीचे || ६६ || व्यंकटा भृकुटिया सुनीळा | कर्णद्वयाची अभिनव लीळा | कुंडलांच्या फाकती कळा | तो सुखसोहळा अलोलिक || ६७ || भाळ विशाळ सुरेख | वरती शोभे कस्तूरीटिळक | केश कुरळ अलोलिक | मस्तकावरी शोभती || ६८ || मस्तकी मुकुट आणि किरीटी | सभोवती झिळमिळ्याची दाटी | त्यावरी मयूरपिच्छांची वेटी |ऐसा जगजेठी देखिला || ६९ || ऐसा तू देवाधिदेव | गुणातीत वासुदेव | माझिया भक्तिस्तव | सगुणरूप झालासी || ७० || आता करू तुझी पूजा | जगज्जीवना अधोक्षजा | आर्ष भावार्थ हा माझा | तुज अर्पण केला असे || ७१ || करुनी पंचामृतस्नान | शुद्धोधक वरी घालून | तुज करू मंगलस्नान | पुरुषसूक्ते करुनिया || ७२ || वस्त्रे आणि यज्ञोपवीत | तुजलागी करू प्रीत्यर्थ | गंधाक्षता पुष्पे बहुत | तुजलागी समर्पू || ७३ || धूप दीप नैवेध्य | फल तांबूल दक्षिणा शुद्ध | वस्त्रे भूषणे गोमेद | पद्मरागादिकरून || ७४ || भक्तवत्सला गोविंदा | ही पूजा अंगीकारावी परमानंदा | नमस्कारुनी पादारविंदा | मग प्रदक्षिणा आरंभिली || ७५ || ऐसा षोडशोपचारे भगवंत | यथाविधी पूजिला हृदयात | मग प्रार्थना आरंभिली बहुत | वरप्रसाद मागावया || ७६ || जयजयाजी श्रुतिशास्त्रआगमा | जयजयाजी गुणातीत परब्रम्हा | जयजयाजी हृदयवासिया रामा | जगदुद्धारा जगद्गुरो || ७७ || जयजयाजी पंकजाक्षा | जयजयाजी कमळाधीशा | जयजयाजी पूर्णपरेशा | अव्यक्तव्यक्ता सुखमूर्ते || ७८ || जयजयाजी भक्तरक्षका | जयजयाजी वैकुंठनायका | जयजयाजी जगपालका | भक्तांसी सखा तू एक || ७९ || जयजयाजी निरंजना | जयजयाजी परात्परगहना | जयजयाजी शुन्यातीत निर्गुणा | परिसावी विज्ञापना एक माझी || ८० || मजलागी देई ऐसा वर | जेणे घडेल परोपकार | हेचि मागणे साचार | वारंवार प्रार्थितसे || ८१ || हा ग्रंथ जो पठण करी | त्यासी दु:ख नसावे संसारी | पठणमात्रे चराचरी | विजयी करी जगाते || ८२ || लग्नार्थीयाचे व्हावे लग्न | धनार्थियासी व्हावे धन | पुत्रार्थियासे मनोरथ पूर्ण | पुत्र देऊनी करावे || ८३ || पुत्र विजयी आणि पंडित | शतायुषी भाग्यवंत | पितृसेवेसी अत्यंत रत | जायचे चित्त सर्वकाळ || ८४ || उदार आणि सर्वज्ञ | पुत्र देई भक्तांलागून | व्याधिष्ठांची पीडा हरण | तत्काळ कीजे गोविंदा || ८५ | क्षय अपस्मार कुष्ठादिरोग | ग्रंथपठणे सरावा भोग | योगाभ्यासियासी योग | पठणमात्रे साधावा || ८६ || दरिद्री व्हावा भाग्यवंत | शत्रूचा व्हावा नि:पात | सभा व्हावी वश समस्त | ग्रंथपठणेकरुनिया || ८७ || विद्यार्थीयासी विद्या व्हावी | युद्धी शस्त्रे न लागावी | पठणे जगात कीर्ती व्हावी | साधु साधु म्हणोनिया || ८८ || अंती व्हावे मोक्षसाधन | ऐसे प्रार्थनेसी दीजे मन | एवढे मागती वरदान | कृपानिधे गोविंदा || ८९ || प्रसन्न झाला व्यंकटरमण | देवीदासासी दिधले वरदान | ग्रंथाक्षरी माझे वचन | यथार्थ जाण निश्चयेसी || ९० || ग्रंथी धरोनी विश्वास | पठण करील रात्रंदिवस | त्यालागी मी जगदीश | क्षण एक न विसंबे || ९१ || इच्छा धरुनी करील पठण | त्याचे सांगतो मी प्रमाण | सर्व कामनेसी साधन | पठण एक मंडळ || ९२ || पुत्रार्थियाने तीन मास | धनार्थियाने एकवीस दिवस | कन्यार्थियाने षण्मास | ग्रंथ आदरे वाचवा || ९३ || क्षय अपस्मार कुष्ठादिरोग | इत्यादि साधने प्रयोग | त्यासी एक मंडळ सांग | पठणे करुनी कार्यसिद्धी || ९४ || हे वाक्य माझे नेमस्त | ऐसे बोलिला श्रीभगवंत | साच न मानी जयाचे चित्त | त्यासी अध:पात सत्य होय || ९५ || विश्वास धरील ग्रंथपठणी | त्यासी कृपा करील चक्रपाणी | वर दिधला कृपा करूनि | अनुभवे कळो येईल || ९६ || गजेंद्राचिया आकांतासी | कैसा पावला हृषीकेशी | प्रल्हादाचिया भावार्थासी | स्तंभातूनि प्रकटला || ९७ || वज्रासाठी गोविंदा | गोवर्धन परमानंदा | उचलोनिया स्वानंदकंदा | सुखी केलें तये वेळी || ९८ || वत्साचेपरी भक्तांसी | मोहे पान्हावे धेनु जैसी | मातेच्या स्नेहतुलनेसी | त्याचपरी घडलेसे || ९९ || ऐसा तू माझा दातार | भक्तासी घालिसी कृपेची पाखर | हा तयाचा निर्धार | अनाथनाथ नाम तुझे || १०० || श्री चैतन्यकृपा अलोकिक | संतोषोनी वैकुंठनायक | वर दिधला अलोकिक | जेणे सुख सकळांसी || १०१ || हा ग्रंथ लिहिता गोविंद | या वचनी न धरावा भेद | हृदयी वसे परमानंद | अनुभवसिद्ध सकळांसी || १०२ || या ग्रंथीचा इतिहास | भावे बोलिला विष्णुदास | आणिक न लागती सायास | पठणमात्रे कार्यसिद्धी || १०३ || पार्वतीस उपदेशी कैलासनायक | पूर्णानंद प्रेमसुख | त्याचा पार न जाणती ब्रम्हादिक | मुनि सुरवर विस्मित || १०४ || प्रत्यक्ष प्रकटेल वनमाळी | त्रैलोक्य भजत त्रिकाळी | ध्याती योगी आणि चंद्रमौळी | शेषाद्रीपर्वती उभा असे || १०५ || देवीदास विनवी श्रोतया चतुरा | प्रार्थनाशतक पठण करा | जावया मोक्षाचिया मंदिरा | काही न लागती सायास || १०६ || एकाग्रचित्ते एकांती | अनुष्ठान कीजे मध्यराती | बैसोनिया स्वस्थचित्ती | प्रत्यक्ष मूर्ति प्रकटेल || १०७ || तेथें देहभावासी नुरे ठाव | अवघा चतुर्भुज देव | त्याचे चरणी ठेवोनि भाव | वरप्रसाद मागावा || १०८ ||
इति श्री देवी दास विरचितं श्री व्यंकटेश स्तोत्रं संपूर्णम | श्री व्यंकटेशार्पणमस्तु ||

॥व्यंकटेश स्तोत्रम्॥ १

व्यंकटेश स्तोत्रम

॥अथ व्यंकटेश स्तोत्रम्॥
कमला कुच चूचुक कुङ्कुमतो
नियतारुणितातुल नीलतनो।
कमलायतलोचन लोकपते
विजयी भव वेङ्कटशैलपते ||१||

सचतुर्मुखषण्मुखपञ्चमुख
प्रमुखाखिलदैवतमौलिमणे।
शरणागतवत्सल सारनिधे
परिपालय मां वृषशैलपते ||२||

अतिवेलतया तव दुर्विषहैः
अनुवेलकृतैरपराधशतैः।
भरितं त्वरितं वृषशैलपते
परया कृपया परिपाहि हरे ||३||

अधिवेङ्कटशैलमुदारमते
जनताभिमताधिकदानरतात्।
परदेवतया गदितान्निगमैः
कमलादयितान्न परं कलये ||४||

कलवेणुरवावशगोपवधू
शतकोटिवृतात्स्मरकोटिसमात्।
प्रतिवल्लविकाभिमतात्सुखदात्
वसुदेवसुतान्न परं कलये ||५||

अभिरामगुणाकर दाशरथे
जगदेकधनुर्धर धीरमते।
रघुनायक राम रमेश विभो
वरदोभव देव दयाजलधे ||६||

अवनीतनयाकमनीयकरं
रजनीकरचारुमुखाम्बुरुहं।
रजनीचरराजतमोमिहिरं
महनीयमहं रघुराम मये ||७||

सुमुखं सुहृदं सुलभं सुखदं
स्वनुजं च सुखायममोघशरं।
अपहाय रघूद्वहमन्यमहं
न कथञ्चन कञ्चन जातु भजे ||८||

विना वेङ्कटेशं न नाथो नाथः
सदा वेङ्कटेशं स्मरामि स्मरामि।
हरे वेङ्कटेश प्रसीद प्रसीद
प्रियं वेङ्कटेश प्रयच्छ प्रयच्छ ||९||

अहं दूरतस्ते पदाम्भोजयुग्म
प्रणामेच्छयाऽऽगत्य सेवां करोमि।
सकृत्सेवया नित्यसेवाफलं त्वं
प्रयच्छ प्रयच्छ प्रभो वेङ्कटेश ||१०||

अज्ञानिना मया दोषान्
अशेषान्विहितान् हरे।
क्षमस्व त्वं क्षमस्व त्वं
शेषशैल शिखामणे ||
॥इति वेङ्कटेश स्तोत्रम्॥


व्यंकटेश स्तोत्रम ३

अस्मद् गुरुभ्यो नमः । अस्मत्परम गुरुभ्यो नमः । अस्मत्सर्व गुरुभ्यो नमः । श्रीमते श्री आदिवण् शठकोप यतीन्द्र महा देशिकाय नमः । यस्याभवद्भक्त जनार्तिहन्तुः पितृत्वमन्येष्वविचार्य तूर्णम् । स्तम्भेऽवतारस्तमनन्यलभ्यं लक्ष्मी नृसिंहं शरणं प्रपद्ये ॥ श्रीमान् वेङ्कट नाथार्यः कवितार्किक केसरी । वेदान्ता चार्य वर्योमे सन्निधत्तां सदाहृदि ॥ गुरुभ्यस्तद् गुरुभ्यश्च नमोवाकमधीमहे । वृणीमहे च तत्राद्यौ दम्पती जगतां पती ॥ श्रीमन्नभीष्ठ वरद । त्वामस्मि शरणं गतः ॥ स्वशेष भूतेन मया स्वीयैः सर्व परिच्छदैः । विधातुं प्रीतमात्मानं देवः प्रक्रमते स्वयम् । शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्व विघ्नोपशान्तये ॥

यस्य द्विरद वक्त्राद्याः पारिषद्याः परःशतम् । विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥ श्रीहयग्रीवस्तोत्रम् ज्ञानानन्दमयं देवं निर्मलस्फटिकाकृतिम् । आधारं सर्वविद्यानां हयग्रीवमुपास्महे ॥ १ ॥
ज्ञानानन्दमयं देवं स्वतस्सिद्धं शुद्धस्फटिक मणिभूभृत्प्रतिभटं सुधासध्रीचीभिर्धुतिभिरवदातत्रिभुवनम् । अनन्तैस्त्रय्यन्तैरनुविहित हेषाहलहलं हताशेषावद्यं हयवदनमीडीमहि महः ॥ २ ॥
स्वतस्सिद्धं शुद्धस्फटिक समाहारस्साम्नां प्रतिपदमृचां धाम यजुषां लयः प्रत्यूहानां लहरिविततिर्वेधजलधेः । कथादर्पक्षुभ्यत्कथककुलकोलाहलभवं हरत्वन्तर्ध्वान्तं हयवदन हेषा हलहलः ॥ ३ ॥
प्राची सन्ध्या काचिदन्तर्निशायाः प्रज्ञादृष्टेरञ्जनश्रीरपूर्वा । वक्त्री वेदान् भातु मे वाजिवक्त्रा वागीशाख्या वासुदेवस्य मूर्तिः ॥ ४ ॥
विशुद्ध विज्ञानघन स्वरूपं विज्ञान विश्राणन बद्धदीक्षम् । दयानिधिं देहभृतां शरण्यं देवं हयग्रीवमहं प्रपद्ये ॥ ५ ॥
अपौरुषेयैरपि वाक्प्रपञ्चैः अद्यापि ते भूतिमदृष्टपाराम् । स्तुवन्नहं मुग्ध इति त्वयैव कारुण्यतो नाथ कटाक्षणीयः ॥ ६ ॥
दाक्षिण्यरम्या गिरिशस्य मूर्तिः देवी सरोजासनधर्मपत्नी । व्यासादयोऽपि व्यपदेश्यवाचः स्फुरन्ति सर्वे तव शक्तिलेशैः ॥ ७ ॥
मन्दोऽभविष्यन्नियतं विरिञ्चो वाचां निधे वञ्चित भागधेयः । दैत्यापनीतान् दययैव भूयोऽपि अध्यापयिष्यो निगमान् न चेत् त्वाम् ॥ ८ ॥
वितर्कडोलां व्यवधूय सत्वे बृहस्पतिं वर्तयसे यतस्त्वम् । तेनैव देव त्रिदशेश्वराणाम् अस्पृष्ट डोलायितमाधिराज्यम् ॥ ९ ॥
अग्नोउ समिद्धार्चिषि सप्ततन्तोः आतस्थिवान् मन्त्रमयं शरीरम् । अखण्ड सारैर्हविषां प्रदानैः आप्यायनं व्योमसदां विधत्से ॥ १० ॥
यन्मूलमीदृक् प्रतिभाति तत्वं या मूलमाम्नाय महाद्रुमाणाम् । तत्वेन जानन्ति विशुद्ध सत्वाः त्वामक्षरामक्षरमातृकां ते ॥ ११ ॥
अव्याकृताद् व्याकृत वानसि त्वं नामानि रूपाणि च यानि पूर्वम् । शंसन्ति तेषां चरमां प्रतिष्टां वागीश्वर त्वां त्वदुपज्ञवाचः ॥ १२ ॥
मुग्धेन्दु निष्यन्द विलोभनीयां मूर्तिं तवानन्द सुधा प्रसूतिम् । विपश्चितश्चेतसि भावयन्ते वेलामुदारामिव दुग्धसिन्धोः ॥ १३ ॥
मनोगतं पश्यति यः सदा त्वां मनीषिणां मानस राजहंसम् । स्वयं पुरोभाव विवादभाजः किङ्कुर्वते तस्य गिरो यथार्हम् ॥ १४ ॥
अपि क्षणार्धं कलयन्ति ये त्वां आप्लावयन्तं विशदैर्मयूखैः । वाचां प्रवाहैरनिवारितैस्ते मन्दाकिनीं मन्दयितुं क्षमन्ते ॥ १५ ॥
स्वामिन् भवद्ध्यान सुधाभिषेकात् वहन्ति धन्याः पुलकानुबन्धम् । अलक्षिते क्वापि निरूढमूलं अङ्गेष्विवानन्दथुम् अङ्कुरन्तम् ॥ १६ ॥
स्वामिन् प्रतीचा हृदयेन धन्याः त्वद्ध्यन चन्द्रोदय वर्धमानम् । अमान्तमानन्द पयोधिमन्तः पयोभिरक्ष्णां परिवाहयन्ति ॥ १७ ॥
स्वैरानुभावास्त्वदधीन भावाः समृद्धवीर्यास्त्वदनुग्रहेण । विपश्चितो नाथ तरन्ति मायां वैहारिकीं मोहन पिञ्छिकां ते ॥ १८ ॥
प्राङ् निर्मितानां तपसां विपाकाः प्रत्यग्रनिश्श्रेयस सम्पदो मे । समेधिषीरंस्तव पादपद्मे सङ्कल्प चिन्तामणयः प्रणामाः ॥ १९ ॥
विलुप्त मूर्धन्य लिपिक्रमाणां सुरेन्द्र चूडापद लालितानाम् । त्वदङ्घ्रिराजीव रजः कणानां भूयान् प्रसादो मयि नाथ भूयात् ॥ २० ॥
परिस्फुरन्नूपुरचित्रभानु - प्रकाश निर्धूत तमोनुषङ्गाम् । पदद्वयीं ते परिचिन्महेऽन्तः प्रबोध राजीव विभातसन्ध्याम् ॥ २१ ॥
त्वत्किङ्करालङ्करणोचितानां त्वयैव कल्पान्तर पालितानाम् । मञ्जुप्रणादं मणिनूपुरं ते मञ्जूषिकां वेदगिरां प्रतीमः ॥ २२ ॥
संचिन्तयामि प्रतिभादशास्थान् संधुक्षयन्तं समयप्रदीपान् । विज्ञान कल्पद्रुम पल्लवाभं व्याख्यान मुद्रा मधुरं करं ते ॥ २३ ॥
चित्ते करोमि स्फुरिताक्षमालं सव्येतरं नाथ करं त्वदीयम् । ज्ञानामृतोदञ्चन लम्पटानां लीलाघटीयन्त्रमिवाश्रितानाम् ॥ २४ ॥
प्रबोध सिन्धोररुणैः प्रकाशैः प्रवाल सङ्घातमिवोद्वहन्तम् । विभावये देव सपुस्तकं ते वामं करं दक्षिणमाश्रितानाम् ॥ २५ ॥
तमांसि भित्वा विशदैर्मयूखैः सम्प्रीणयन्तं विदुषश्चकोरान् । निशामये त्वां नवपुण्डरीके शरद्घने चन्द्रमिव स्फुरन्तम् ॥ २६ ॥
दिशन्तु मे देव सदा त्वदीयाः दयातरङ्गानुचराः कटाक्षाः । श्रोत्रेषु पुंसाममृतं क्षरन्तीं सरस्वतीं संश्रित कामधेनुम् ॥ २७ ॥
विशेषवित्वारिषदेषु नाथ विदग्ध गोष्ठीसमराङ्गणेषु । जिगीषतो मे कवितार्किकेन्द्रान् जिह्वाग्र सिंहासनमभ्युपेयाः ॥ २८ ॥
त्वां चिन्तयंस्त्वन्मयतां प्रपन्नः त्वामुद्गृणन् शब्दमयेन धाम्ना । स्वामिन् समाजेषु समेधिषीय स्वच्छन्द वादाहव बद्धशूरः ॥ २९ ॥
नानाविधानामगतिः कलानां न चापि तीर्थेषु कृतावतारः । ध्रुवं तवानाथपरिग्रहायाः नवं नवं पात्रमहं दयायाः ॥ ३० ॥
अकम्पनीयान्यपनीति भेदैः अलंकृषीरन् हृदयं मदीयम् । शङ्काकलङ्का पगमोज्ज्वलानि तत्वानि सम्यञ्चि तव प्रसादात् ॥ ३१ ॥
व्याख्या मुद्रां करसरसिजैः पुस्तकं शङ्कचक्रे बिभ्रद्भिन्नस्फटिकरुचिरे पुण्डरीके निषण्णः । अम्लानश्रीरमृतविशदैरंशुभिः प्लावयन् मां आविर्भूयादनघ महिमा मानसे वागधीशः ॥ ३२ ॥
व्याख्या मुद्रां करसरसिजैः वागर्थ सिद्धिहेतोः पठत हयग्रीवसंस्तुतिं भक्त्या । कवितार्किक केसरिणा वेङ्कटनाथेन विरचितामेताम् ॥ ३३ ॥
वागर्थ सिद्धिहेतोः कवितार्किकसिंहाय कल्याणगुणशालिने । श्रीमते वेङ्कटेशाय वेदान्तगुरवे नमः ॥



श्री गणपती स्थापना प्राणप्रतिष्ठा पूजाविधी अभिषेक सह

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