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आद्य शंकराचार्य विरचित निर्वाण षटकाचा मराठी अनुवाद ....

आद्य शंकराचार्य विरचित निर्वाण षटकाचा मराठी अनुवाद ....
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मन चित्त बुद्धी अहंकार नाही
मी कान डोळे जीभ नाक नाही
आकाश पृथ्वी न वायू न तेज
चिदानंदरूपी शिव तो मी आहे ।।

न मी पंचप्राण न मी पंचवायु
न मी सप्तधातु न मी पंचकोष
न वाणी न पदहस्त कर्मेंद्रिये मी
चिदानंदरूपी शिव तो मी आहे ।।

न मी राग द्वेष न मी लोभ मोह
मदमत्सरादी रिपु तो मी नाही
धर्मार्थ कामादि पुरुषार्थ नाही
चिदानंदरूपी शिव तो मी आहे ।।

न मी पुण्यपाप न सुखदुःखही मी
न मी मंत्र तीर्थ न मी वेद यज्ञ
न भोजन न भोज्य न भोक्ता असे मी
चिदानंदरूपी शिव तो मी आहे ।। 

न मृत्यू न शंका न मज जातीभेद
न माता पिता ना मज जन्म नाही
न बंधू न मित्र न गुरु शिष्य कोणी
चिदानंदरूपी शिव तो मी आहे ।।

मी निर्विकल्प निराकार रूप
मी सर्वव्यापी  मी सर्वज्ञानी
न मुक्ती न बंधन असे मी अमेय
चिदानंदरूपी शिव तो मी आहे ।।

      भाषांतरकार- कवी अनिल शेंडे।

।। संकटमोचन हनुमानाष्टक ।।



।। संकटमोचन हनुमानाष्टक ।।

 

बाल समय रबि भक्षि लियो तब, तीनहुँ लोक भयो अंधियारो।

ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो ।।

देवन आनि करी बिनती तब, छाडि दियो रबि कष्ट निवारो।

 

को नहि जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो...

 

बालि की त्रास कपीस बसै गिरी, जात महाप्रभु पंथ निहारो।

चौकि महा मुनि साप दियो तब, चाहिये कौन बिचार बिचारो ।।

के द्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के सोक निवारो,

 

को नहि जानत...

 

अंगद के सँग लेन गये सिय, खोज कपीस यह बैन उचारो ।

जीवत न बची हो हम सो जु, बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो ।।

हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय, सिया-सुधि प्रान ऊबारो,

 

को नहि जानत...

 

रावन त्रास दई सिय को सब, राक्षस सों कहि सोक निवारो।

ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजीनचर मारो चाहत

सीय असोक सों आगि सु, दै प्रभु मुद्रिका शोक निवारो,

 

को नहि जानत...

 

बान लग्यो उर लछिमन के तब, प्राण तजे सुत रावन मारो।

 

लै गृह बैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारों ।।

आनि सजीवन हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्रान उबारो,

 

को नहि जानत...

 

रावन जुद्ध अजान कियो तब, नाग कि फाँस सबै सिर डारो

श्री रुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो ।।

आनि खगेस तबै हनुमान जु, बंधन काटि सुत्रास निवारो.

 

को नहि जानत...

 

बंधु समेत जबै अहिरावन, लै रधुनाथ पताल सिधारो।

देबि पूजि भली बिधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो ।।

जाय सहाय भयो तब ही, अहिरावन सैन्य समेत सँहारो.

 

को नहि जानत...

 

काज किये बड देवन के तुम, बीर महाप्रभु देखी बिचारो।

कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसों नहिं जात है टारो ।।

बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कुछ संकट होय हमारो.

 

को नहि जानत...

 

 

 


।। सूर्याष्टक स्तोत्र ।।



 ।। सूर्याष्टक स्तोत्र ।।


आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर | 
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तुते ||

सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम् | 
श्वेतपद्मधरं देवं तँ सूर्यं प्रणमाम्यहं || 

लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम् | 
महापापहरं देवं तँ सूर्यं प्रणमाम्यहं || 

त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरं | 
महापापहरं देवं तँ सूर्यं प्रणमाम्यहं ||

बृंहितं तेजःपुंजं च वायुमाकाशमेव च | 
प्रभुं च सर्वलोकानां तँ सूर्यं प्रणमाम्यहं || 

बन्धूकपुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम् |
एकचक्रधरं देवं तँ सूर्यं प्रणमाम्यहं ||

तँ सूर्य जगत्कर्तारं महातेजःप्रदीपनम् |
महापापहरं देवं तँ सूर्यं प्रणमाम्यहं || 

तँ सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम् |
महापापहरं देवं तँ सूर्यं प्रणमाम्यहं || 

|| श्रीशिवप्रोक्तं सूर्याष्टकं सम्पूर्णं ||



लग्नाच्या मराठी मंगलाष्टकं

स्वस्ति श्री गणनायकं गजमुखम, मोरेश्वरम सिद्धीधम ।

बल्लाळो मुरुडम विनायकमहम चिन्तामणि स्थेवरम।

लेण्याद्री गिरीजात्मकम सुरवरदम विघ्नेश्वरम् ओझरम ।

ग्रामो रांजण संस्थीतम गणपति।

कुर्या सदा मंगलम शुभ मंगल सावधान।।१।।


गंगा सिंधु सरस्वतीच यमुना,गोदावरी नर्मदा ।

कावेरी शरयू महेंद्रतनया शर्मण्वति वेदीका ।

शिप्रा वेञवती महासूर नदी,ख्याता गया गंडकी। 

पुर्णा पुर्ण जलै, समुद्र सरीता।

कुर्या सदा मंगलम शुभ मंगल सावधान।।२।।


लक्ष्मी कैस्तुभ परिजातक सुरा धन्वंतरीश्वचंद्रमा।

 गाव कामदुधा सरेश्वर गजो, रंभादिदेवांगना ।

अश्क सप्त मखो विषम हरिधनु शंखो मृतम चांबुधे ।

रत्नानीह चतुर्दश प्रतिदिनम,कुर्वतु वो मंगलम।

कुर्या सदा मंगलम शुभ मंगल सावधान।।३।।


रामो राजमणी सदा विजयते रामम्।

रमेशम भजे रामेणाभिहता निशाचरचमु।

रामाय तस्मै नमः।

रामान्नस्ति परायणम् परतम् रामस्य दासोराम्यहम् ।

रामे चित्तलय सद भवतु मे भी राम मामुघ्दर।

कुर्या सदा मंगलम शुभ मंगल सावधान।।४।।


राणा भिमक रुक्मीणीस नयनी, देखोनी चिंता करी ।

हि कन्या सगुणा वरा नृपवरा, कवणासी म्या दिईजे।

आता एक विचार कृष्ण नवरा ,त्यासी समर्पु म्हणे। 

रुख्मी पुञ वडील त्यासी पुसणे ।

कुर्या सदा मंगलम शुभ मंगल सावधान।।५।।


लाभो संतती संपदा बहु तुम्हा,लाभोतही सद्रुण ।

साधोनि स्थिर कर्मयोग अपुल्या, व्हा बांधवा भूषण।

सारे राष्ट्रधुरिण हेचि कथिती किर्ति करा उज्वल।

गा ग्रहास्याश्रम हा तुम्हा वधूवरा देवो सदा मंगलम् ।

कुर्या सदा मंगलम शुभ मंगल सावधान।।६।।


विष्णूला फमला शिवसी गिरीजा, कृष्णा जशी रुक्मिणी।

सिंधुला सरिता तरुसि लतिका,चंद्रा जशी रोहिणी ।

रामासी जनकात्मजा प्रिया जशी, सवित्री सत्यवरता ।

तैशि ही वधु सजिरी वरीतसे, हर्ष वरासी आता।

कुर्या सदा मंगलम शुभ मंगल सावधान।।७।।


आली लग्न घडी समीप नवरा घेऊनि यावा घरा।

गृहतके मधुपर्क पुजन करा अन्त पाटते धरा।

दृष्टादृष्ट वद्य वरा न करिता , दोघे करावी उभी।

वाजंञे बहु गलबला न करणे, लक्ष्मीपते मंगलम।

कुर्या सदा मंगलम शुछ मंगल सावधान।।८।।

 


।। अथ मंगलाष्टक मंत्र ।। लग्नाच्या संस्कृत मंगलाष्टके

।। अथ मंगलाष्टक मंत्र ।।

ॐ श्री मत्पंकजविष्टरो हरिहरौ, वायुमर्हेन्द्रोऽनलः। चन्द्रो भास्कर वित्तपाल वरुण, प्रताधिपादिग्रहाः। प्रद्यम्नो नलकूबरौ सुरगजः, चिन्तामणिः कौस्तुभः, स्वामी शक्तिधरश्च लांगलधरः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥

गंगा गोमतिगोपतिगर्णपतिः, गोविन्दगोवधर्नौ, गीता गोमयगोरजौ गिरिसुता, गंगाधरो गौतमः। गायत्री गरुडो गदाधरगया, गम्भीरगोदावरी, गन्धवर्ग्रहगोपगोकुलधराः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥

नेत्राणां त्रितयं महत्पशुपतेः अग्नेस्तु पादत्रयं, तत्तद्विष्णुपदत्रयं त्रिभुवने, ख्यातं च रामत्रयम्। गंगावाहपथत्रयं सुविमलं, वेदत्रयं ब्राह्मणम्, संध्यानां त्रितयं द्विजैरभिमतं, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥

बाल्मीकिः सनकः सनन्दनमुनिः, व्यासोवसिष्ठो भृगुः, जाबालिजर्मदग्निरत्रिजनकौ, गर्गोऽ गिरा गौतमः। मान्धाता भरतो नृपश्च सगरो, धन्यो दिलीपो नलः, पुण्यो धमर्सुतो ययातिनहुषौ, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥

गौरी श्रीकुलदेवता च सुभगा, कद्रूसुपणार्शिवाः, सावित्री च सरस्वती च सुरभिः, सत्यव्रतारुन्धती। स्वाहा जाम्बवती च रुक्मभगिनी, दुःस्वप्नविध्वंसिनी, वेला चाम्बुनिधेः समीनमकरा, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥

 गंगा सिन्धु सरस्वती च यमुना, गोदावरी नमर्दा, कावेरी सरयू महेन्द्रतनया, चमर्ण्वती वेदिका। शिप्रा वेत्रवती महासुरनदी, ख्याता च या गण्डकी, पूर्णाः पुण्यजलैः समुद्रसहिताः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥

लक्ष्मीः कौस्तुभपारिजातकसुरा, धन्वन्तरिश्चन्द्रमा, गावः कामदुघाः सुरेश्वरगजो, रम्भादिदेवांगनाः। अश्वः सप्तमुखः सुधा हरिधनुः, शंखो विषं चाम्बुधे, रतनानीति चतुदर्श प्रतिदिनं, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥

ब्रह्मा वेदपतिः शिवः पशुपतिः, सूयोर् ग्रहाणां पतिः, शुक्रो देवपतिनर्लो नरपतिः, स्कन्दश्च सेनापतिः। विष्णुयर्ज्ञपतियर्मः पितृपतिः, तारापतिश्चन्द्रमा, इत्येते पतयस्सुपणर्सहिताः, कुवर्न्तु वो मंगलम्॥

।। इति मंगलाष्टक समाप्त ।।

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॥ तोटकाष्टकम् ॥

श्री ऋगवैदिय पूर्वाम्नाय गोवर्धनमठ पुरीपीठ के प्रथम श्रीमज्जगदगुरु शंकराचार्य श्री स्वामी पद्मपादाचार्य जी ने जगदगुरु आदि शंकराचार्य भगव‍न‍ा की स्तुति में " तोटकाष्टकम " स्तोत्र लिखा है जिसे " शंकर देशिकाष्टकम" स्तोत्र भी कहा जाता है । अत्यंत ही ललित , सौन्दर्य परिपूर्ण और मधुर स्तोत्र है ।

 

॥ तोटकाष्टकम् ॥

 

विदिताखिलशास्त्रसुधाजलधे

महितोपनिषत् कथितार्थनिधे ।

हृदये कलये विमलं चरणं

भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ १॥

 

करुणावरुणालय पालय मां

भवसागरदुःखविदूनहृदम् ।

रचयाखिलदर्शनतत्त्वविदं

भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ २॥

 

भवता जनता सुहिता भविता

निजबोधविचारण चारुमते ।

कलयेश्वरजीवविवेकविदं

भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ ३॥

 

भव एव भवानिति मे नितरां

समजायत चेतसि कौतुकिता ।

मम वारय मोहमहाजलधिं

भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ ४॥

 

सुकृतेऽधिकृते बहुधा भवतो

भविता समदर्शनलालसता ।

अतिदीनमिमं परिपालय मां

भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ ५॥

 

जगतीमवितुं कलिताकृतयो

विचरन्ति महामहसश्छलतः ।

अहिमांशुरिवात्र विभासि गुरो

भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ ६॥

 

गुरुपुंगव पुंगवकेतन ते

समतामयतां नहि कोऽपि सुधीः ।

शरणागतवत्सल तत्त्वनिधे

भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ ७॥

 

विदिता न मया विशदैककला

न च किंचन काञ्चनमस्ति गुरो ।

द्रुतमेव विधेहि कृपां सहजां

भव शंकर देशिक मे शरणम् ॥ ८॥

 

इति श्रीमत्तोटकाचार्यविरचितं

श्रीशङ्करदेशिकाष्टकं सम्पूर्णम् ।

 

गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व की आप सभी को बहुत बहुत शुभकामनाऐं ।

 

हर हर महादेव , हर हर शंकर जय जय शंकर , जय श्री जगन्नाथ ।

 


श्री गणपती स्थापना प्राणप्रतिष्ठा पूजाविधी अभिषेक सह

🟠🚩पुजा साहित्य यादी : हळद, कुंकु, गुलाल, शेंदूर, गूळ-खोबरे, समई, नीरंजन, अष्टगंध, अक्षदा, रांगोळी, फुलवात वात, तेलवात, काडे पेटी, पळी भांड...

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